Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 117 / 18

शु॒नम॒न्धाय॒ भर॑मह्वय॒त्सा वृ॒कीर॑श्विना वृषणा॒ नरेति॑। जा॒रः क॒नीन॑ इव चक्षदा॒न ऋ॒ज्राश्व॑: श॒तमेकं॑ च मे॒षान् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 117 | Mantra No : 18

In Hindi:

ऋषि : कक्षीवान् | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर राज-विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : शु॒नम्। अ॒न्धाय॑। भर॑म्। अ॒ह्व॒य॒त्। सा। वृ॒कीः। अ॒श्वि॒ना॒। वृ॒ष॒णा॒। नरा॑। इति॑। जा॒रः। क॒नीनः॑ऽइव। च॒क्ष॒दा॒नः। ऋ॒ज्रऽअ॑श्वः। श॒तम्। एक॑म्। च॒। मे॒षान् ॥ १.११७.१८

पदार्थ : हे (वृषणा) सुख वर्षाने और (नरा) धर्म-अधर्म का विवेक करनेहारे (अश्विना) सभा सेनाधीशो ! (सा) वह (वृकीः) चोर की स्त्री (शतम्) सौ (च) और (एकम्) एक (मेषान्) भेंड़-मेढ़ों को (अह्वयत्) हाँक देकर जैसे बुलावे (इति) इस प्रकार वा (ऋज्राश्वः) सीधी चाल चलनेहारे घोड़ोंवाला (चक्षदानः) जिससे कि विद्या वचन दिया जाता है उस (जारः) बुड्ढे वा जार कर्म करनेहारे चालाक (कनीनइव) प्रकाशमान मनुष्य के समान तुम (अन्धाय) अन्धे के लिये (भरम्) पोषण अर्थात् उसकी पालना और (शुनम्) सुख धारण करो ॥ १८ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजपुरुष अविद्या से अन्धे हो रहे जनों को अन्यायकारियों से, उत्तम सती स्त्रियों को लंपट वेश्याबाजों से, जैसे भेड़ियों से भेड़-बकरों को बचावें, वैसे निरन्तर बचा कर पालें ॥ १८ ॥