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Rigveda / 1 / 118 / 6

उद्वन्द॑नमैरतं दं॒सना॑भि॒रुद्रे॒भं द॑स्रा वृषणा॒ शची॑भिः। निष्टौ॒ग्र्यं पा॑रयथः समु॒द्रात्पुन॒श्च्यवा॑नं चक्रथु॒र्युवा॑नम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 118 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : कक्षीवान् | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : उत्। वन्द॑नम्। ऐ॒र॒त॒म्। दं॒सना॑भिः। उत्। रे॒भम्। द॒स्रा॒। वृ॒ष॒णा॒। शची॑भिः। निः। तौ॒ग्र्यम्। पा॒र॒य॒थः॒। स॒मु॒द्रात्। पुन॒रिति॑। च्यवा॑नम्। च॒क्र॒थुः॒। युवा॑नम् ॥ १.११८.६

पदार्थ : हे (दस्रा) दुःखों के दूर करने और (वृषणा) सुख वर्षानेवाले सभासेनाधीशो ! तुम दोनों (शचीभिः) कर्म और बुद्धियों वा (दंसनाभिः) वचनों के साथ जैसे (तौग्र्यम्) बलवान् मारनेवाला राजा का पुत्र (च्यवानम्) जो गमनकर्त्ता बली (युवानम्) ज्वान है उसको (समुद्रात्) सागर से (निः, पारयथः) निरन्तर पार पहुँचाते (पुनः) फिर इस ओर आए हुए को (उत्, चक्रथुः) उधर पहुँचाते हो वैसे ही (वन्दनम्) प्रशंसा करने योग्य यान और (रेभम्) प्रशंसा करनेवाले मनुष्य को (उदैरतम्) इधर-उधर पहुँचाओ ॥ ६ ॥

भावार्थ : जैसे नाव के चलानेवाले मल्लाह आदि मनुष्यों को समुद्र के पार पहुँचाकर सुखी करते हैं, वैसे राजसभा शिल्पीजनों और उपदेश करनेवालों को दुःख से पार पहुँचाकर निरन्तर आनन्द देवें ॥ ६ ॥