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Rigveda / 1 / 119 / 3

सं यन्मि॒थः प॑स्पृधा॒नासो॒ अग्म॑त शु॒भे म॒खा अमि॑ता जा॒यवो॒ रणे॑। यु॒वोरह॑ प्रव॒णे चे॑किते॒ रथो॒ यद॑श्विना॒ वह॑थः सू॒रिमा वर॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 119 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : कक्षीवान् दैर्घतमसः | देवता : अश्विनौ | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर अगले मन्त्र में स्त्री-पुरुष के करने योग्य काम का उपदेश किया है ।

पदपाठ : सम्। यत्। मि॒थः। प॒स्पृ॒धा॒नासः॑। अग्म॑त। शु॒भे। म॒खाः। अमि॑ताः। जा॒यवः॑। रणे॑। यु॒वोः। अह॑। प्र॒व॒णे। चे॒कि॒ते॒। रथः॑। यत्। अ॒श्वि॒ना॒। वह॑थः। सू॒रिम्। आ। वर॑म् ॥ १.११९.३

पदार्थ : हे (अश्विना) स्त्री-पुरुषो ! (यत्) जो विद्वान् (चेकिते) युद्ध करने को जानता है वा जो (युवोः) तुम दोनों का (रथः) अति सुन्दर रथ (मिथः) परस्पर युद्ध के बीच लड़ाई करनेहारा है वा जिस (वरम्) अति श्रेष्ठ (सूरिम्) युद्ध विद्या के जाननेवाले धार्मिक विद्वान् को तुम (वहथः) प्राप्त होते उसके साथ वर्त्तमान (अह) शत्रुओं के बाँधने वा उनको हार देने में (यत्) जिस (शुभे) अच्छे गुण के पाने के लिये (प्रवणे) जिसमें वीर जाते हैं उस (रणे) संग्राम में (पस्पृधानासः) ईर्ष्या से एक दूसरे को बुलाते हुए (मखाः) यज्ञ के समान उपकार करनेवाले (अमिताः) न गिराये हुए (जायवः) शत्रुओं को जीतनेहारे वीरपुरुष (समग्मत) अच्छे प्रकार जायें उसके लिये (आ) उत्तम यत्न भी करें ॥ ३ ॥

भावार्थ : राजपुरुष जब शत्रुओं को जीतने को अपनी सेना पठावें तब जिन्होंने धन पाया, जो करे को जाननेवाले, युद्ध में चतुर औरों से युद्ध करानेवाले विद्वान् जन वे सेनाओं के साथ अवश्य जावें। और सब सेना उन विद्वानों के अनुकूलता से युद्ध करें जिससे निश्चल विजय हो। जब युद्ध निवृत्त हो रुक जाय और अपने-अपने स्थान पर वीर बैठें तब उन सबको इकट्ठा कर आनन्द देकर जीतने के ढंग की बातें-चीतें करें, जिससे वे सब युद्ध करने के लिये उत्साह बाँध के शत्रुओं को अवश्य जीतें ॥ ३ ॥