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Rigveda / 1 / 119 / 8

अग॑च्छतं॒ कृप॑माणं परा॒वति॑ पि॒तुः स्वस्य॒ त्यज॑सा॒ निबा॑धितम्। स्व॑र्वतीरि॒त ऊ॒तीर्यु॒वोरह॑ चि॒त्रा अ॒भीके॑ अभवन्न॒भिष्ट॑यः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 119 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : कक्षीवान् दैर्घतमसः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : अग॑च्छतम्। कृप॑माणम्। प॒रा॒ऽवति॑। पि॒तुः। स्वस्य॑। त्यज॑सा। निऽबा॑धितम्। स्वः॑ऽवतीः। इ॒तः। ऊ॒तीः। यु॒वोः। अह॑। चि॒त्राः। अ॒भीके॑। अ॒भ॒व॒न्। अ॒भिष्ट॑यः ॥ १.११९.८

पदार्थ : हे विद्या के विचार में रमे हुए स्त्री-पुरुषो ! आप (स्वस्य) अपने (पितुः) पिता के समान वर्त्तमान पढ़ानेवाले से (परावति) दूर देश में भी ठहरे और (त्यजसा) संसार के सुख को छोड़ने से (निबाधितम्) कष्ट पाते हुए (कृपमाणम्) कृपा करने के शीलवाले संन्यासी को नित्य (अगच्छतम्) प्राप्त होओ (इतः) इसी यति से (युवोः) तुम दोनों के (अभीके) समीप में (अह) निश्चय से (चित्राः) अद्भुत (अभिष्टयः) चाही हुई (स्वर्वतीः) जिनमें प्रशंसित सुख विद्यमान हैं (ऊतीः) वे रक्षा आदि कामना (अभवन्) सिद्ध हों ॥ ८ ॥

भावार्थ : सब मनुष्य पूरी विद्या जानने और शास्त्रसिद्धान्त में रमनेवाले राग-द्वेष और पक्षपातरहित सबके ऊपर कृपा करते सर्वथा सत्ययुक्त असत्य को छोड़े, इन्द्रियों को जीते और योग के सिद्धान्त को पाये हुए अगले-पिछले व्यवहार को जाननेवाले जीवन्मुक्त संन्यास के आश्रम में स्थित संसार में उपदेश करने के लिये नित्य भ्रमते हुए वेदविद्या के जाननेवाले संन्यासीजन को पाकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्षों की सिद्धियों को विधान के साथ पावें। ऐसे संन्यासी आदि उत्तम विद्वान् के सङ्ग और उपदेश के सुने विना कोई भी मनुष्य यथार्थ बोध को नहीं पा सकता ॥ ८ ॥