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Rigveda / 1 / 120 / 4

वि पृ॑च्छामि पा॒क्या॒३॒॑ न दे॒वान्वष॑ट्कृतस्याद्भु॒तस्य॑ दस्रा। पा॒तं च॒ सह्य॑सो यु॒वं च॒ रभ्य॑सो नः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 120 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : उशिक्पुत्रः कक्षीवान् | देवता : अश्विनौ | छन्द : आर्ष्यनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : वि। पृ॒च्छा॒मि॒। पा॒क्या॑। न। दे॒वान्। वष॑ट्ऽकृतस्य। अ॒द्भु॒तस्य॑। द॒स्रा॒। पा॒तम्। च॒। सह्य॑सः। यु॒वम्। च॒। रभ्य॑सः। नः॒ ॥ १.१२०.४

पदार्थ : हे (दस्रा) दुःखों के दूर करने, पढ़ाने और उपदेश करनेहारे विद्वानो ! मैं (युवम्) तुम दोनों को (सह्यसः) अतीव विद्याबल से भरे हुए (रभ्यसः) अत्यन्त उत्तम पुरुषार्थयुक्त (पाक्या) विद्या और योग के अभ्यास से जिनकी बुद्धि पक गई उन (देवान्) विद्वानों के (न) समान (वषट्कृतस्य) क्रिया से सिद्ध किये हुए शिल्पविद्या से उत्पन्न होनेवाले (अद्भुतस्य) आश्चर्य्य रूप काम के विज्ञान के लिये प्रश्नों को (वि, पृच्छामि) पूछता हूँ (च) और तुम दोनों उनके उत्तर देओ जिससे मैं तुम्हारी सेवा करता हूँ (च) और तुम (नः) हमारी (पातम्) रक्षा करो ॥ ४ ॥

भावार्थ : विद्वान् जन नित्य बालक आदि वृद्ध पर्य्यन्त मनुष्यों को सिद्धान्त विद्याओं का उपदेश करें, जिससे उनकी रक्षा और उन्नति होवे और वे भी उनकी सेवा कर अच्छे स्वभाव से पूछ कर विद्वानों के दिये हुए समाधानों को धारण करें, ऐसे हिलमिल के एक दूसरे के उपकार से सब सुखी हों ॥ ४ ॥