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Rigveda / 1 / 120 / 9

दु॒ही॒यन्मि॒त्रधि॑तये यु॒वाकु॑ रा॒ये च॑ नो मिमी॒तं वाज॑वत्यै। इ॒षे च॑ नो मिमीतं धेनु॒मत्यै॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 120 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : उशिक्पुत्रः कक्षीवान् | देवता : अश्विनौ | छन्द : भुरिगनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : दु॒ही॒यन्। मि॒त्रऽधि॑तये। यु॒वाकु॑। रा॒ये। च॒। नः॒। मि॒मी॒तम्। वाज॑ऽवत्यै। इ॒षे। च॒। नः॒। मि॒मी॒त॒म्। धेनु॒ऽमत्यै॑ ॥ १.१२०.९

पदार्थ : हे सब विद्याओं में व्याप्त सभासेनाधीशो ! तुम दोनों जो गौयें (दुहीयन्) दूध आदि से पूर्ण करती हैं उनको (नः) हमारे (मित्रधितये) जिससे मित्रों की धारणा हो तथा (युवाकु) सुख से मेल वा दुःख से अलग होना हो उस (राये) धन के (च) और जीवने के लिये (मिमीतम्) मानो तथा (वाजवत्यै) जिसमें प्रशंसित ज्ञान वा (धेनुमत्यै) गौ का संबन्ध विद्यमान है उसके (च) और (इषे) इच्छा के लिये (नः) हमको (मिमीतम्) प्रेरणा देओ अर्थात् पहुँचाओ ॥ ९ ॥

भावार्थ : जो गौ आदि पशु मित्रों की पालना, ज्ञान और धन के कारण हों उनको मनुष्य निरन्तर राखें और सबको पुरुषार्थ के लिये प्रवृत्त करें जिससे सुख का मेल और दुःख से अलग रहें ॥ ९ ॥