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Rigveda / 1 / 121 / 5

तुभ्यं॒ पयो॒ यत्पि॒तरा॒वनी॑तां॒ राध॑: सु॒रेत॑स्तु॒रणे॑ भुर॒ण्यू। शुचि॒ यत्ते॒ रेक्ण॒ आय॑जन्त सब॒र्दुघा॑या॒: पय॑ उ॒स्रिया॑याः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 121 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : औशिजो दैर्घतमसः कक्षीवान् | देवता : विश्वे देवा इन्द्रश्च | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : तुभ्य॑म्। पयः॑। यत्। पि॒तरौ॑। अनी॑ताम्। राधः॑। सु॒ऽरेतः॑। तु॒रणे॑। भु॒र॒ण्यू इति॑। शुचि॑। यत्। ते॒। रेक्णः॑। अय॑जन्त। स॒बः॒ऽदुघा॑याः। पयः॑। उ॒स्रिया॑याः ॥ १.१२१.५

पदार्थ : हे सज्जन ! (यत्) जिस (तुरणे) दूध आदि पदार्थ के पीने को जल्दी करते हुए (तुभ्यम्) तेरे लिये (भुरण्यु) धारण और पुष्टि करनेवाले (पितरौ) माता-पिता (सुरेतः) जिससे उत्तम वीर्य उत्पन्न होता उस (पयः) दूध और (राधः) उत्तम सिद्धि करनेवाले धन की (अनीताम्) प्राप्ति करावें और जैसे (यत्) दूध आदि के पीने को जल्दी करते हुए जिस (ते) तेरे लिये दयालु गौ आदि पशुओं को राखनेवाले मनुष्य (सबर्दुघायाः) जिससे एकसा सुख धारण करना होता है, उस दूध को पूरा करनेहारी (उस्रियायाः) उत्तम पुष्टि देती हुई गौ के (शुचि) शुद्ध पवित्र (पयः) पीने योग्य दूध को (रेक्णः) प्रशंसित धन के समान (आ, अयजन्त) भली-भाँति देवें, वैसे उन मनुष्यों की तूँ निरन्तर सेवा कर और उनके उपकार को कभी मत तोड़ ॥ ५ ॥

भावार्थ : मनुष्य लोग जैसे माता-पिता और विद्वानों की सेवा से धर्म के साथ सुखों की प्राप्त होवें, वैसे ही गौ आदि पशुओं की रक्षा से धर्म के साथ सुख पावें। इनके मन के विरुद्ध आचरण को कभी न करें क्योंकि ये सबका उपकार करनेवाले प्राणी हैं, इससे ॥ ५ ॥