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Rigveda / 1 / 127 / 8

विश्वा॑सां त्वा वि॒शां पतिं॑ हवामहे॒ सर्वा॑सां समा॒नं दम्प॑तिं भु॒जे स॒त्यगि॑र्वाहसं भु॒जे। अति॑थिं॒ मानु॑षाणां पि॒तुर्न यस्या॑स॒या। अ॒मी च॒ विश्वे॑ अ॒मृता॑स॒ आ वयो॑ ह॒व्या दे॒वेष्वा वय॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 127 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : अग्निः | छन्द : अष्टिः | स्वर : मध्यमः

विषय : अब कैसे राजा और प्रजाजनों की उन्नति हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : विश्वा॑साम्। त्वा॒। वि॒शाम्। पति॑म्। ह॒वा॒म॒हे॒। सर्वा॑साम्। स॒मा॒नम्। दम्ऽप॑तिम्। भु॒जे। स॒त्यऽगि॑र्वाहसम्। भु॒जे। अति॑थिम्। मानु॑षाणाम्। पि॒तुः। न। यस्य॑। आ॒स॒या। अ॒मी इति॑। च॒। विश्वे॑। अ॒मृता॑सः। आ। वयः॑। ह॒व्या। दे॒वेषु॑। आ। वयः॑ ॥ १.१२७.८

पदार्थ : हे मनुष्य ! जैसे हम लोग (भुजे) शरीर में विद्या का आनन्द भोगने के लिये (विश्वासाम्) सब (विशाम्) प्रजाजनों के वा (सर्वासाम्) समस्त क्रियाओं के (पतिम्) पालनेहारे अधिपति (त्वा) तुझको (हवामहे) स्वीकार करते हैं (च) और जैसे (अमी) वे (देवेषु) (आ) अच्छे प्रकार (वयः) विद्यादि गुणों को चाहनेवाले (हव्या) ग्रहण करने योग्य ज्ञानों का ग्रहण किये और (आ, वयः) अच्छे प्रकार विद्या आदि गुणों को पाये हुए (विश्वे) सब (अमृतासः) अमर अर्थात् विद्या प्रकाश से मृत्यु दुःख से रहित हुए हम लोग (यस्य) जिसकी (आसया) बैठक के (पितुः) अन्न के (न) समान (भुजे) विद्यानन्द भोगने के लिये (मानुषाणाम्) मनुष्यों के (समानम्) पक्षपातरहित (अतिथिम्) अतिथि के तुल्य सत्कार करने योग्य (सत्यगिर्वाहसम्) सत्यवाणी की प्राप्ति करानेवाले तुझ पालनेहारे को स्वीकार करते वैसे (दम्पतिम्) स्त्री-पुरुष का सेवन करते हैं ॥ ८ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जब तक पक्षपातरहित समग्र विद्या को जाने हुए धर्मात्मा विद्वान् राज्य के अधिकारी नहीं होते हैं, तब तक राजा और प्रजाजनों की उन्नति भी नहीं होती है ॥ ८ ॥