Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 128 / 3

एवे॑न स॒द्यः पर्ये॑ति॒ पार्थि॑वं मुहु॒र्गी रेतो॑ वृष॒भः कनि॑क्रद॒द्दध॒द्रेत॒: कनि॑क्रदत्। श॒तं चक्षा॑णो अ॒क्षभि॑र्दे॒वो वने॑षु तु॒र्वणि॑:। सदो॒ दधा॑न॒ उप॑रेषु॒ सानु॑ष्व॒ग्निः परे॑षु॒ सानु॑षु ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 128 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : अग्निः | छन्द : विराडत्यष्टिः | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : एवे॑न। स॒द्यः। परि॑। ए॒ति॒। पार्थि॑वम्। मु॒हुः॒ऽगीः। रेतः॑। वृ॒ष॒भः। कनि॑क्रदत्। दधत्। रेतः॑। कनि॑क्रदत्। श॒तम्। चक्षा॑णः। अ॒क्षऽभिः॑। दे॒वः। वने॑षु। तु॒र्वणिः॑। सदः॑। दधा॑नः। उप॑रेषु। सानु॑षु। अ॒ग्निः। परे॑षु। सानु॑षु ॥ १.१२८.३

पदार्थ : हे विद्वान् ! आप जैसे (मुहुर्गीः) बार-बार वाणी को प्राप्त (रेतः) जल को (कनिक्रदत्) निरन्तर गर्जाता सा (रेतः) पराक्रम को (कनिक्रदत्) अतीव शब्दायमान करता और (दधत्) धारण करता हुआ (वृषभः) वर्षा करने और (वनेषु) किरणों में (तुर्वणिः) अन्धकार और शीत का विनाश करता हुआ (देवः) निरन्तर प्रकाशमान (उपरेषु) मेघों और (सानुषु) अलग अलग पर्वत के शिखरों वा (परेषु) उत्तम (सानुषु) पर्वतों के शिखरों में (सदः) जिनमें जन बैठते हैं, उन स्थानों को (दधानः) धारण करता हुआ (अग्निः) बिजुली तथा सूर्यरूप अग्नि (एवेन) अपनी लपट-झपट चाल से (पार्थिवम्) पृथिवी में जाने हुए पदार्थ को (सद्यः) शीघ्र (पर्येति) सब ओर से प्राप्त होता वैसे (अक्षभिः) इन्द्रियों से (शतम्) सैकड़ों उपदेशों को (चक्षाणः) करनेवाले होते हुए प्रसिद्ध हूजिये ॥ ३ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य और वायु सबको धारण और मेघ को वर्षाकर सब जगत् का आनन्द करते, वैसे विद्वान् जन वेद विद्या को धारण कर औरों के आत्माओं में अपने उपदेशों को वर्षा कर सब मनुष्यों को सुख देते हैं ॥ ३ ॥