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Rigveda / 1 / 128 / 7

स मानु॑षे वृ॒जने॒ शंत॑मो हि॒तो॒३॒॑ऽग्निर्य॒ज्ञेषु॒ जेन्यो॒ न वि॒श्पति॑: प्रि॒यो य॒ज्ञेषु॑ वि॒श्पति॑:। स ह॒व्या मानु॑षाणामि॒ळा कृ॒तानि॑ पत्यते। स न॑स्त्रासते॒ वरु॑णस्य धू॒र्तेर्म॒हो दे॒वस्य॑ धू॒र्तेः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 128 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृदष्टिः | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर वे क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : सः। मानु॑षे। वृ॒जने॑। शम्ऽत॑मः। हि॒तः। अ॒ग्निः। य॒ज्ञेषु॑। जेन्यः॑। न। वि॒श्पतिः॑। प्रि॒यः। य॒ज्ञेषु॑। वि॒श्पतिः॑। सः। ह॒व्या। मानु॑षाणाम्। इ॒ळा। कृ॒तानि॑। प॒त्य॒ते॒। सः। नः॒। त्रा॒स॒ते॒। वरु॑णस्य। धू॒र्तेः। म॒हः। दे॒वस्य॑। धू॒र्तेः ॥ १.१२८.७

पदार्थ : जो (प्रियः) तृप्ति करनेवाला है वह (विश्पतिः) प्रजाओं का पालक राजा (नः) हम लोगों को (धूर्त्तेः) हिंसक से (त्रासते) वेमन कराता और (सः) वह (धूर्त्तेः) अविद्या को नाशने और (महः) बड़े (देवस्य) विद्या देनेवाले (वरुणस्य) उत्तम विद्वान् के पास से जो (यज्ञेषु) सङ्ग करने योग्य व्यवहारों में (मानुषाणाम्) मनुष्यों के (इळा) अच्छे संस्कारों से युक्त (कृतानि) सिद्ध किये शुद्ध वचन (हव्या) जो कि ग्रहण करने योग्य हों उनको स्थिर करता तथा (सः) वह सबको (पत्यते) प्राप्त होता वा (यज्ञेषु) अग्निहोत्र आदि यज्ञों में (अग्निः) अग्नि के समान वा (जेन्यः) विजयशील के (न) समान (विश्पतिः) प्रजाजनों का पालनेवाला (मानुषे) मनुष्यों के (वृजने) उस मार्ग में कि जिसमें गमन करते (हितः) हित सिद्ध करनेवाला (शंतमः) अतीव सुखकारी होता (सः) वह विद्वान् सबको सत्कार करने योग्य होता है ॥ ७ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो धर्म मार्ग में मनुष्यों को उपदेश से प्रवृत्त कराते, न्यायाधीश राजा के समान प्रजाजनों को पालने, डाँकू आदि दुष्ट प्राणियों से जो डर उसको निवृत्त करानेवाले विद्वानों के मित्रजन हैं, वे ही अन्धपरम्परा अर्थात् कुमार्ग के रोकनेवाले होने को योग्य होते हैं ॥ ७ ॥