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Rigveda / 1 / 129 / 3

द॒स्मो हि ष्मा॒ वृष॑णं॒ पिन्व॑सि॒ त्वचं॒ कं चि॑द्यावीर॒ररुं॑ शूर॒ मर्त्यं॑ परिवृ॒णक्षि॒ मर्त्य॑म्। इन्द्रो॒त तुभ्यं॒ तद्दि॒वे तद्रु॒द्राय॒ स्वय॑शसे। मि॒त्राय॑ वोचं॒ वरु॑णाय स॒प्रथ॑: सुमृळी॒काय॑ स॒प्रथ॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 129 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराडत्यष्टिः | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर कौन संसार का उपकार करनेवाले होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : द॒स्मः। हि। ष्म॒। वृष॑णम्। पिन्व॑सि। त्वच॑म्। कम्। चि॒त्। या॒वीः॒। अ॒ररु॑म्। शू॒र॒। मर्त्य॑म्। प॒रि॒ऽवृ॒णक्षि॑। मर्त्य॑म्। इन्द्र॑। उ॒त। तुभ्य॑म्। तत्। दि॒वे। तत्। रु॒द्राय॑। स्वऽय॑शसे। मि॒त्राय॑। वोच॑म्। वरु॑णाय। स॒ऽप्रथः॑। सु॒ऽमृ॒ळी॒काय॑। स॒ऽप्रथः॑ ॥ १.१२९.३

पदार्थ : हे (शूर) शत्रुओं को मारनेवाले (इन्द्र) सभापति ! (हि) जिस कारण (दस्मः) शत्रुओं को विनाशनेहारे आप जिस (कञ्चित्) किसी (त्वचम्) धर्म के ढाँपनेवाले को (यावीः) पृथक् करते और (वृषणम्) विद्यादि गुणों के वर्षाने (अररुम्) वा दूसरे को उनकी प्राप्ति करानेवाले (मर्त्यम्) मनुष्य के समान (मर्त्यम्) मनुष्य को (परिवृणक्षि) सब ओर से छोड़ते स्वतन्त्रता देते वा (पिन्वसि) उसका सेवन करते हैं, इस कारण उस (स्वयशसे) स्वकीर्त्ति से युक्त (मित्राय) सबके मित्र के लिये वा (तुभ्यम्) आपके लिये (तत्) उस व्यवहार को (वोचम्) मैं कहूँ वा (दिवे) कामना करने (रुद्राय) दुष्टों को रुलाने (वरुणाय) श्रेष्ठ धर्म आचरण करने (सुमृळीकाय) और उत्तम सुख करनेवाले के लिये (सप्रथः) सब प्रकार के विस्तार से युक्त मनुष्य के समान (सप्रथः) प्रसिद्धि अर्थात् उत्तम कीर्त्तियुक्त (तत्) उस उक्त आपके उत्तम व्यवहार को (उत) तर्क-वितर्क से (स्म) ही कहूँ ॥ ३ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सब मनुष्यों के लिये मित्रभाव से सत्य का उपदेश करते वा धर्म का सेवन करते, वे परम सुख के देनेवाले होते हैं ॥ ३ ॥