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Rigveda / 1 / 129 / 7

व॒नेम॒ तद्धोत्र॑या चि॒तन्त्या॑ व॒नेम॑ र॒यिं र॑यिवः सु॒वीर्यं॑ र॒ण्वं सन्तं॑ सु॒वीर्य॑म्। दु॒र्मन्मा॑नं सु॒मन्तु॑भि॒रेमि॒षा पृ॑चीमहि। आ स॒त्याभि॒रिन्द्रं॑ द्यु॒म्नहू॑तिभि॒र्यज॑त्रं द्यु॒म्नहू॑तिभिः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 129 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराडतिशक्वरी | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर माता आदि को सन्तान कैसे उपदेशों से समझाने चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : व॒नेम॑। तत्। होत्र॑या। चि॒तन्त्या॑। व॒नेम॑। र॒यिम्। र॒यि॒ऽवः॒। सु॒ऽवीर्य॑म्। र॒ण्वम्। सन्त॑म्। सु॒ऽवीर्य॑म्। दुः॒ऽमन्मा॑नम्। सु॒मन्तु॑ऽभिः। आ। ई॒म्। इ॒षा। पृ॒ची॒म॒हि॒। आ। स॒त्याभिः॑। इन्द्र॑म्। द्यु॒म्नहू॑तिऽभिः। यज॑त्रम्। द्यु॒म्नहू॑तिऽभिः ॥ १.१२९.७

पदार्थ : हे (रयिवः) धनवान् ! जैसे हम लोग (होत्रया) ग्रहण करने योग्य (चितन्त्या) चेतानेवाली बुद्धिमती (=बुद्धिमानी) से जिस ज्ञान का (वनेम) अच्छे प्रकार सेवन करें वा (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ पराक्रमयुक्त (रयिम्) धन तथा (सन्तम्) वर्त्तमान (रण्वम्) उपदेश करनेवाले (सुवीर्य्यम्) विद्या और धर्म से उत्तम आत्मा के बल का (वनेम) सेवन करें वा (सुमन्तुभिः) उत्तम विद्यायुक्त पुरुषों और (ईम्) पाने योग्य (इषा) इच्छा से (दुर्मन्मानम्) दुष्ट जन मान करनेहारे को जो मारनेवाला उसका (आ, पृचीमहि) अच्छे प्रकार सम्बन्ध करें तथा (द्युम्नहूतिभिः) धन वा यश की बातचीतों से (यजत्रम्) अच्छे प्रकार सङ्ग करने योग्य व्यवहार के समान (सत्याभिः) सत्य आचरणयुक्त (द्युम्नहूतिभिः) धनविषयक बातों से (इन्द्रम्) परम ऐश्वर्य का (आ) अच्छे प्रकार सम्बन्ध करें वैसे (तत्) उक्त समस्त व्यवहार को आप भजो और उससे सम्बन्ध करो ॥ ७ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। माता और पिता आदि को वा विद्वानों को चाहिये कि अपने सन्तानों को इस प्रकार उपदेश करें कि जो हमारे धर्म के अनुकूल काम हैं, वे आचरण करने योग्य किन्तु और काम आचरण करने योग्य नहीं, ऐसे सत्याचरणों और परोपकार से निरन्तर ऐश्वर्य्य की उन्नति करनी चाहिये ॥ ७ ॥