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Rigveda / 1 / 135 / 6

इ॒मे वां॒ सोमा॑ अ॒प्स्वा सु॒ता इ॒हाध्व॒र्युभि॒र्भर॑माणा अयंसत॒ वायो॑ शु॒क्रा अ॑यंसत। ए॒ते वा॑म॒भ्य॑सृक्षत ति॒रः प॒वित्र॑मा॒शव॑:। यु॒वा॒यवोऽति॒ रोमा॑ण्य॒व्यया॒ सोमा॑सो॒ अत्य॒व्यया॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 135 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : वायु: | छन्द : निचृदष्टिः | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : इ॒मे। वा॒म्। सोमाः॑। अ॒प्ऽसु। आ। सु॒ताः। इ॒ह। अ॒ध्व॒र्युऽभिः॑। भर॑माणाः। अ॒यं॒स॒त॒। वायो॒ इति॑। शु॒क्राः। अ॒यं॒स॒त॒। ए॒ते। वा॒म्। अ॒भि। अ॒सृ॒क्ष॒त॒। ति॒रः। प॒वित्र॑म्। आ॒शवः॑। यु॒वा॒ऽयवः॑। अति॑। रोमा॑णि। अ॒व्यया॑। सोमा॑सः। अति॑। अ॒व्यया॑ ॥ १.१३५.६

पदार्थ : हे परमऐश्वर्य्ययुक्त और (वायो) पवन के समान बलवान् ! जो (इमे) ये (इह) इस संसार में (अध्वर्युभिः) यज्ञ की चाहना करनेवालों ने (अप्सु) जलों में (सुताः) उत्पन्न की (सोमाः) बड़ी-बड़ी ओषधि (भरमाणाः) पुष्टि करती हुई तुम दोनों को (अयंसत) देवें और (शुक्राः) शुद्ध वे (अयंसत) लेवें वा जो (एते) ये (आशवः) इकट्ठे होते और (युवायवः) तुम दोनों की इच्छा करते हुए (सोमासः) ऐश्वर्य्ययुक्त (अव्यया) नाशरहित (अति, रोमाणि) अतीव रोमा अर्थात् नारियल की जटाओं के आकार (अति, अव्यया) सनातन सुखों के समान (तिरः) औरों से तिरछे (पवित्रम्) शुद्धि करनेवाले पदार्थों और (वाम्) तुम दोनों को (अभि, असृक्षत) चारों ओर से सिद्ध करें उनको तुम पीओ और अच्छे प्रकार प्राप्त होओ ॥ ६ ॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जिनके सेवन से दृढ़ और आरोग्ययुक्त देह और आत्मा होते हैं तथा जो अन्तःकरण को शुद्ध करते, उनका तुम नित्य सेवन करो ॥ ६ ॥