Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 136 / 4

अ॒यं मि॒त्राय॒ वरु॑णाय॒ शंत॑म॒: सोमो॑ भूत्वव॒पाने॒ष्वाभ॑गो दे॒वो दे॒वेष्वाभ॑गः। तं दे॒वासो॑ जुषेरत॒ विश्वे॑ अ॒द्य स॒जोष॑सः। तथा॑ राजाना करथो॒ यदीम॑ह॒ ऋता॑वाना॒ यदीम॑हे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 136 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : भुरिगष्टिः | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर इस संसार में मनुष्यों को कैसे वर्त्तना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : अ॒यम्। मि॒त्राय॑। वरु॑णाय॑। शम्ऽत॑मः। सोमः॑। भू॒तु॒। अ॒व॒ऽपाने॑षु। आऽभ॑गः। दे॒वः। दे॒वेषु॑। आऽभ॑गः। तम्। दे॒वासः॑। जु॒षे॒र॒त॒। विश्वे॑। अ॒द्य। स॒ऽजोष॑सः। तथा॑। रा॒जा॒ना॒। क॒र॒थः॒। यत्। ईम॑हे। ऋत॑ऽवाना। यत्। ईम॑हे ॥ १.१३६.४

पदार्थ : जैसे (अयम्) यह (अवपानेषु) अत्यन्त रक्षा आदि व्यवहारों में (मित्राय) सबके मित्र और (वरुणाय) सबसे उत्तम के लिये (आभगः) समस्त ऐश्वर्य (शन्तमः) अतीव सुख (सोमः) और सुखयुक्त ऐश्वर्य्य करनेवाला न्याय (भूतु) हो वैसे जो (देवः) सुख अच्छे प्रकार देनेवाला (देवेषु) दिव्य विद्वानों और दिव्य गुणों में (आभगः) समस्त सौभाग्य हो (तम्) उसको (अद्य) आज (सजोषसः) समान धर्म का सेवन करनेवाले (विश्वे) समस्त (देवासः) विद्वान् जन (जुषेरत) सेवन करें वा उससे प्रीति करें और जैसे (यत्) जिस व्यवहार को (राजाना) प्रकाशमान सभा सेनापति (करथः) करें (तथा) वैसे उस व्यवहार को हम लोग (ईमहे) माँगते और जैसे (ऋतावाना) सत्य का सम्बन्ध करनेवाले (यत्) जिस काम को करें, वैसे उसको हम लोग भी (ईमहे) याचें माँगें ॥ ४ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। इस संसार में जैसे शास्त्रवेत्ता विद्वान् धर्म के अनुकूल व्यवहार से ऐश्वर्य्य की उन्नति कर सबके उपकार करनेहारे काम में खर्च करते वा जैसे सत्य व्यवहार को जानने की इच्छा करनेवाले धार्मिक विद्वानों को याचते अर्थात् उनसे अपने प्रिय पदार्थ को माँगते, वैसे सब मनुष्य अपने ऐश्वर्य को अच्छे काम में खर्च करें और विद्वान् महाशयों से विद्याओं की याचना करें ॥ ४ ॥