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Rigveda / 1 / 139 / 2

यद्ध॒ त्यन्मि॑त्रावरुणावृ॒तादध्या॑द॒दाथे॒ अनृ॑तं॒ स्वेन॑ म॒न्युना॒ दक्ष॑स्य॒ स्वेन॑ म॒न्युना॑। यु॒वोरि॒त्थाधि॒ सद्म॒स्वप॑श्याम हिर॒ण्यय॑म्। धी॒भिश्च॒न मन॑सा॒ स्वेभि॑र॒क्षभि॒: सोम॑स्य॒ स्वेभि॑र॒क्षभि॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 139 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : विराडत्यष्टिः | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : यत्। ह॒। त्यत्। मि॒त्रा॒व॒रु॒णौ॒। ऋ॒तात्। अधि॑। आ॒द॒दाथे॒ इत्या॑ऽद॒दाथे॑। अनृ॑तम्। स्वेन॑। म॒न्युना॑। दक्ष॑स्य। स्वेन॑। म॒न्युना॑। यु॒वोः। इ॒त्था। अधि॑। सद्म॑ऽसु। अप॑श्याम। हि॒र॒ण्यय॑म्। धी॒भिः। च॒न। मन॑सा। स्वेभिः॑। अ॒क्षऽभिः॑। सोम॑स्य। स्वेभिः॑। अ॒क्षऽभिः॑ ॥ १.१३९.२

पदार्थ : हे (मित्रावरुणौ) प्राण और उदान के समान वर्त्तमान सभासेनाधीश पुरुषो ! (सद्मसु) घरों में (मनसा) उत्तम बुद्धि के साथ (धीभिः) कामों से (सोमस्य) ऐश्वर्य्य के (स्वेभिः) निज उत्तमोत्तम ज्ञान वा (अक्षभिः) प्राणों के समान (स्वेभिः) अपनी (अक्षभिः) इन्द्रियों के साथ वर्त्ताव रखते हुए हम लोग (युवोः) तुम्हारे घरों में (हिरण्ययम्) सुवर्णमय धन को (अधि, अपश्याम) अधिकता से देखें (चन) और भी (यत्) जो सत्य है, (त्यत् ह) उसीको (ऋतात्) सत्य जो धर्म के अनुकूल व्यवहार उससे ग्रहण करें, (स्वेन) अपने (मन्युना) क्रोध व्यवहार से (दक्षस्य) बल के साथ (अनृतम्) मिथ्या व्यवहार को छोड़ें, तुम भी (स्वेन) अपने (मन्युना) क्रोधरूपी व्यवहार से मिथ्या व्यवहार को छोड़ो। जैसे आप सत्य व्यवहार से सत्य (अभि, आ ददाथे) अधिकता से ग्रहण करो (इत्था) इस प्रकार हम लोग भी ग्रहण करें ॥ २ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को सत्य ग्रहण और असत्य का त्याग कर अपने पुरषार्थ से पूरा बल और ऐश्वर्य्य सिद्ध कर अपना अन्तःकरण और अपने इन्द्रियों को सत्य काम में प्रवृत्त करना चाहिये ॥ २ ॥