Rigveda / 7 / 64 / 4
यो वां॒ गर्तं॒ मन॑सा॒ तक्ष॑दे॒तमू॒र्ध्वां धी॒तिं कृ॒णव॑द्धा॒रय॑च्च । उ॒क्षेथां॑ मित्रावरुणा घृ॒तेन॒ ता रा॑जाना सुक्षि॒तीस्त॑र्पयेथाम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 64 | Mantra No : 4
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : mitraavaruNau | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yo vaa.m garta.m manasaa takShadetamuurdhvaa.m dhiiti.m kRRiNavaddhaarayachcha . ukShethaa.m mitraavaruNaa ghRRitena taa raajaanaa sukShitiistarpayethaam .
Component Words : yaH . vaam . gartam . manasaa . takShat . etam . uurdhvaam . dhiitim . kRRiNavat . dhaarayat . cha . ukShethaam . mitraavaruNaa . ghRRitena . taa . raajaanaa . su.akShitiiH . tarpayethaam . 7.64.4
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : यः । वा॒म् । गर्त॑म् । मन॑सा । तक्ष॑त् । ए॒तम् । ऊ॒र्ध्वाम् । धी॒तिम् । कृ॒णव॑त् । धा॒रय॑त् । च॒ । उ॒क्षेथा॑म् । मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ । घृ॒तेन॑ । ता । रा॒जा॒ना॒ । सु॒ऽक्षि॒तीः । त॒र्प॒ये॒था॒म् ॥ ७.६४.४
पदार्थ : (यः) जो (राजाना) राजा लोग (मित्रावरुणा) अध्यापक तथा उपदेशकों को (घृतेन) स्नेह से (उक्षेथां) सिञ्चन करते हैं, (ताः) वे (सुक्षितीः) सम्पूर्ण प्रजा को (तर्पयेथां) तृप्त करते हैं (च) और जो (वां) अध्यापक तथा उपदेशकों के (गर्तं) गूढाशयों का (मनसा) मन से (तक्षत्) विचार कर (एवं) उन (ऊर्ध्वां, धीतिम्) उन्नत कर्मों को (धारयत्) धारण करके (कृणवत्) करते हैं, वे सदैव उत्रत होते हैं ॥४॥
भावार्थ : परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो राजा लोग अपनी प्रजा में विद्या तथा धार्मिक भावों के प्रचारार्थ अध्यापक और बड़े-बड़े विद्वान् धार्मिक उपदेशकों का अपने स्नेह से पालन-पोषण करते हैं, वे अपनी प्रजा को उन्नत करते हैं और जो प्रजाजन उन महात्माओं के उपदेशों को मन से विचार कर अनुष्ठान करते हैं, वे कभी अवनति को प्राप्त नहीं होते, प्रत्युत सद उन्नति की ओर जाते हैं ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : यः । वा॒म् । गर्त॑म् । मन॑सा । तक्ष॑त् । ए॒तम् । ऊ॒र्ध्वाम् । धी॒तिम् । कृ॒णव॑त् । धा॒रय॑त् । च॒ । उ॒क्षेथा॑म् । मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ । घृ॒तेन॑ । ता । रा॒जा॒ना॒ । सु॒ऽक्षि॒तीः । त॒र्प॒ये॒था॒म् ॥ ७.६४.४
भावार्थ :