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Rigveda / 7 / 67 / 3

अ॒भि वां॑ नू॒नम॑श्विना॒ सुहो॑ता॒ स्तोमै॑: सिषक्ति नासत्या विव॒क्वान् । पू॒र्वीभि॑र्यातं प॒थ्या॑भिर॒र्वाक्स्व॒र्विदा॒ वसु॑मता॒ रथे॑न ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 67 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : अ॒भि । वा॒म् । नू॒नम् । अ॒श्वि॒ना॒ । सुऽहो॑ता । स्तोमैः॑ । सि॒स॒क्ति॒ । ना॒स॒त्या॒ । वि॒व॒क्वान् । पू॒र्वीभिः॑ । या॒त॒म् । प॒थ्या॑भिः । अ॒र्वाक् । स्वः॒ऽविदा॑ । वसु॑ऽमता । रथे॑न ॥ ७.६७.३

पदार्थ : (अश्विना) हे सेनाधीश राजपुरुषों ! (वां) तुम लोग (नूनं) निश्चय करके (सुहोता) उत्तम होता बनकर (स्तोमैः) यज्ञानुष्ठान (सिषक्ति) करते हुए शिक्षा प्राप्त करो कि (नासत्या, विवक्वान्) तुम कभी असत्य न बोलो (पूर्वीभिः, पथ्याभिः, अर्वाक्) सनातन मार्गों को अभिमुख करके (स्वर्विदा, वसुमता) ऐश्वर्य्य तथा धन प्राप्त होनेवाले (रथेन) मार्ग से (यातं) चलो ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में परमात्मा राजपुरुषों को उपदेश करते हैं कि तुम लोग वैदिक यज्ञ करते हुए सत्यवक्ता होकर सदा सनातन सन्मार्गों से चलो, जिससे तुम्हारा ऐश्वर्य्य बढ़े और तुम उस ऐश्वर्य्य के स्वामी होकर सत्यपूर्वक प्रजा का पालन करो ॥३॥