Rigveda / 7 / 69 / 8
नू मे॒ हव॒मा शृ॑णुतं युवाना यासि॒ष्टं व॒र्तिर॑श्विना॒विरा॑वत् । ध॒त्तं रत्ना॑नि॒ जर॑तं च सू॒रीन्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒: सदा॑ नः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 69 | Mantra No : 8
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : ashvinau | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : nuu me havamaa shRRiNuta.m yuvaanaa yaasiShTa.m vartirashvinaaviraavat . dhatta.m ratnaani jarata.m cha suuriinyuuya.m paata svastibhiH sadaa naH .
Component Words : nu . me . havam . aa . shRRiNutam . yuvaanaa . yaasiShTam . vartiH . ashvinau . iraa.avat . dhattam . ratnaani . jaratam . cha . suuriin . yuuyam . paata . svasti.abhiH . sadaa . naH . 7.69.8
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : नु । मे॒ । हव॑म् । आ । शृ॒णु॒त॒म् । यु॒वा॒ना॒ । या॒सि॒ष्टम् । व॒र्तिः । अ॒श्वि॒नौ॑ । इरा॑ऽवत् । ध॒त्तम् । रत्ना॑नि । जर॑तम् । च॒ । सू॒रीन् । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥ ७.६९.८
पदार्थ : (युवाना, अश्विनौ) हे युवावस्था को प्राप्त राजपुरुषो ! (नु) निश्चय करके (मे) मेरे (हवं) इस उपदेश को (आ) भली-भाँति (शृणुतं) सुनो (इरावत् वर्तिः, यासिष्टं) तुम लोग ऐश्वर्य्यशाली देशों के मार्गों को जाओ और वहाँ (सूरीन् जरतं) शूरवीरों को उपलब्ध करके (रत्नानि, धत्तं) रत्नों को धारण करो (च) और परमात्मा से प्रार्थना करो कि (यूयं) आप (नः) हमको (स्वस्तिभिः) कल्याणदायक उपदेशों से (सदा) सदैव (पात) पवित्र करें ॥८॥
भावार्थ : परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे युवा शूरवीर योद्धाओ ! तुम धन-धान्य से पूरित ऐश्वर्य्यशाली देशों की ओर जाओ और वहाँ के शूरवीरों को विजय करके विविध प्रकार के धनों को लाभ करो और विजय के साथ ही परमात्मा से प्रार्थना करो कि हे भगवन् ! आप अपने सदुपदेशों से हमें सदा पवित्र करें, ताकि हम से कोई अनिष्ट कर्म न हो और आप हमारी इस विजय में सदा सहायक हों ॥८॥ यह ६९ वाँ सूक्त और १६ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : नु । मे॒ । हव॑म् । आ । शृ॒णु॒त॒म् । यु॒वा॒ना॒ । या॒सि॒ष्टम् । व॒र्तिः । अ॒श्वि॒नौ॑ । इरा॑ऽवत् । ध॒त्तम् । रत्ना॑नि । जर॑तम् । च॒ । सू॒रीन् । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥ ७.६९.८
भावार्थ :