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Rigveda / 7 / 70 / 7

इ॒यं म॑नी॒षा इ॒यम॑श्विना॒ गीरि॒मां सु॑वृ॒क्तिं वृ॑षणा जुषेथाम् । इ॒मा ब्रह्मा॑णि युव॒यून्य॑ग्मन्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒: सदा॑ नः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 70 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब परमात्मस्तुति का उपदेश करते हैं।

पदपाठ : इ॒यम् । म॒नी॒षा । इ॒यम् । अ॒श्वि॒ना॒ । गीः । इ॒माम् । सु॒ऽवृ॒क्तिम् । वृ॒ष॒णा॒ । जु॒षे॒था॒म् । इ॒मा । ब्रह्मा॑णि । यु॒व॒ऽयूनि॑ । अ॒ग्म॒न् । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥ ७.७०.७

पदार्थ : (वृषणा) हे विद्यादि की कामनाओं को पूर्ण करनेवाले (अश्विना) ज्ञानी तथा विज्ञानी विद्वानों ! (इयं, मनीषा) यह बुद्धि (इयं, गीः) यह वाणी (इमां, सुवृक्तिम्) इन परमात्मस्तुतियों को (जुषेथां) आप सेवन   करें, (युवयूनि) जो तुम से सम्बन्ध रखती हैं और (इमा, ब्रह्माणि) यह ब्रह्मप्रतिपादक स्तोत्र (अग्मन्) तुम्हें प्राप्त हों और तुम सदैव यह प्रार्थना करो कि (वः) हमको (यूयं) आप (सदा) सर्वदा (स्वस्तिभिः) स्वस्तिवाचनों से (पात) पवित्र करें ॥७॥

भावार्थ : परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वानों ! तुम इस वेदवाणी का सदा सेवन करो, जो विद्या की वृद्धि द्वारा सब कामनाओं के पूर्ण करनेवाली है। तुम सदैव वेद के उन स्तोत्रों का पाठ करो, जिनमें परमात्मा की स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना का वर्णन किया गया है, जिससे तुम्हारा जीवन पवित्र होकर परमात्मप्राप्ति के योग्य हो ॥७॥ यह ७० वाँ सूक्त, चौथा अनुवाक और १७ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥