Rigveda / 7 / 78 / 2
प्रति॑ षीम॒ग्निर्ज॑रते॒ समि॑द्ध॒: प्रति॒ विप्रा॑सो म॒तिभि॑र्गृ॒णन्त॑: । उ॒षा या॑ति॒ ज्योति॑षा॒ बाध॑माना॒ विश्वा॒ तमां॑सि दुरि॒ताप॑ दे॒वी ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 78 | Mantra No : 2
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : uShaaH | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : prati Shiimagnirjarate samiddhaH prati vipraaso matibhirgRRiNantaH . uShaa yaati jyotiShaa baadhamaanaa vishvaa tamaa.msi duritaapa devii .
Component Words : prati . siim . agniH . jarate . sam.aiddhaH . prati . vipraasaH . mati.abhiH . gRRiNantaH . uShaaH . yaati . jyotiShaa . baadhamaanaa . vishvaa . tamaa.msi . duH.aitaa . apa . devii . 7.78.2
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : उषाः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अब परमात्मस्वरूप का महत्त्व कथन करते हैं।
पदपाठ : प्रति॑ । सी॒म् । अ॒ग्निः । ज॒र॒ते॒ । सम्ऽइ॑द्धः । प्रति॑ । विप्रा॑सः । म॒तिऽभिः॑ । गृ॒णन्तः॑ । उ॒षाः । या॒ति॒ । ज्योति॑षा । बाध॑माना । विश्वा॑ । तमां॑सि । दुः॒ऽइ॒ता । अप॑ । दे॒वी ॥ ७.७८.२
पदार्थ : (देवी) परमात्मा का दिव्यस्वरूप (दुरिता अप) पापों को दूर करता तथा (विश्वा तमांसि) सब प्रकार के अज्ञानों को (बाधमाना) निवृत्त करता हुआ (ज्योतिषा) अपने ज्ञान से (उषाः) उच्च गति को (याति) प्राप्त है। (विप्रासः) वेदवेत्ता ब्राह्मण उसको (मतिभिः) स्व बुद्धियों से (गृणन्तः) ग्रहण करते हैं, (प्रति) उनको परमात्मस्वरूप (समिद्धः) सम्यक् रीति से प्रकाशित होता और (अग्निः) ज्योतिस्वरूप परमात्मा (सीं) भली-भाँति (प्रति जरते) प्रत्येक में व्यापकभाव से प्रकाशित हो रहा है ॥२॥
भावार्थ : ज्ञानस्वरूप परमात्मा का दिव्यस्वरूप सदैव प्रकाशमान हुआ अज्ञानरूप अन्धकार को निवृत्त करके ज्ञानरूप ज्योति का विस्तार करता अर्थात् उषारूप ज्योति के समान उच्चभाव को प्राप्त होता है। वह वेदवेत्ता ब्राह्मणों की बुद्धि का विषय होने से उनके प्रति प्रकाशित होता अर्थात् वे परमात्मस्वरूप को अपनी निर्मल बुद्धि से भली-भाँति अवगत करते हैं। अधिक क्या, उसका दिव्य स्वरूप संसार के प्रत्येक पदार्थ में ओत-प्रोत हो रहा है, इसलिए सब पुरुषों को उचित है कि वह परमात्मस्वरूप को अपने-अपने हृदय में अवगत करते हुए अपने जीवन को उच्च बनावें अर्थात् जिस प्रकार उषःकाल अन्धकार को निवृत्त करके प्रकाशमय हो जाता है, इसी प्रकार परमात्मा अज्ञानरूप अन्धकार को दूर करके अपने प्रकाश से विद्वानों के हृदय को प्रकाशित करता है ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : उषाः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अथ परमात्मस्वरूपमहत्त्वं कथ्यते।
पदपाठ : प्रति॑ । सी॒म् । अ॒ग्निः । ज॒र॒ते॒ । सम्ऽइ॑द्धः । प्रति॑ । विप्रा॑सः । म॒तिऽभिः॑ । गृ॒णन्तः॑ । उ॒षाः । या॒ति॒ । ज्योति॑षा । बाध॑माना । विश्वा॑ । तमां॑सि । दुः॒ऽइ॒ता । अप॑ । दे॒वी ॥ ७.७८.२
भावार्थ :