Rigveda / 7 / 79 / 4
ताव॑दुषो॒ राधो॑ अ॒स्मभ्यं॑ रास्व॒ याव॑त्स्तो॒तृभ्यो॒ अर॑दो गृणा॒ना । यां त्वा॑ ज॒ज्ञुर्वृ॑ष॒भस्या॒ रवे॑ण॒ वि दृ॒ळ्हस्य॒ दुरो॒ अद्रे॑रौर्णोः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 79 | Mantra No : 4
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : uShaaH | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : taavaduSho raadho asmabhya.m raasva yaavatstotRRibhyo arado gRRiNaanaa . yaa.m tvaa jaj~nurvRRiShabhasyaa raveNa vi dRRiLhasya duro adreraurNoH .
Component Words : taavat . uShaH . raadhaH . asmabhyam . raasva . yaavat . stotRRi.abhyaH . aradaH . gRRiNaanaa . yaam . tvaa . jaj~nuH . vRRiShabhasya . raveNa . vi . dRRiLhasya . duraH . adreH . aurNoH . 7.79.4
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : उषाः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : ताव॑त् । उषः॑ । राधः॑ । अ॒स्मभ्य॑म् । रा॒स्व॒ । याव॑त् । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । अर॑दः । गृ॒णा॒ना । याम् । त्वा॒ । ज॒ज्ञुः । वृ॒ष॒भस्य॑ । रवे॑ण । वि । दृ॒ळ्हस्य॑ । दुरः॑ । अद्रेः॑ । औ॒र्णोः॒ ॥ ७.७९.४
पदार्थ : (उषः) हे ज्ञानस्वरूप परमात्मन् ! (अस्मभ्यं) हमलोगों को (अरदः) प्रथम (तावत् राधः रास्व) उतना धन प्रदान करें, (यावत्) जितने से हम (गृणाना) आपको ग्रहण करनेवाले (स्तोतृभ्यः) स्तोता विद्वानों को प्रसन्न कर सकें, (यां त्वा) जो आपको (वृषभस्य रवेण जज्ञुः) वृषभ के समान उच्चस्वर से प्रकट कर रहे हैं अर्थात् आपकी स्तुति करते हैं और हमारे लिये (दृळ्हस्य दुरः अद्रेः) दृढ़तायुक्त कठिन से कठिन मार्गों को (वि) भली-भाँति (और्णोः) खोल दें ॥४॥
भावार्थ : हे सर्वपालक भगवन् ! आप हमको ऐश्वर्य्यसम्पन्न करें, जिससे हम अपने वेदवेत्ता स्तोता आदि विद्वानों को प्रसन्न करें, जो हमारे प्रति आपकी स्तुति उच्चस्वर से वर्णन करते हैं, या यों कहो कि परमात्मस्तुति-कीर्तन करते हुए हमको आपकी उपासना में प्रवृत्त करते हैं। हे भगवन् ! आप हममें ऐसी शक्ति प्रदान करें कि कठिन से कठिन मार्गों के द्वारों को खोलकर आपका दर्शन कर सकें ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : उषाः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : ताव॑त् । उषः॑ । राधः॑ । अ॒स्मभ्य॑म् । रा॒स्व॒ । याव॑त् । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । अर॑दः । गृ॒णा॒ना । याम् । त्वा॒ । ज॒ज्ञुः । वृ॒ष॒भस्य॑ । रवे॑ण । वि । दृ॒ळ्हस्य॑ । दुरः॑ । अद्रेः॑ । औ॒र्णोः॒ ॥ ७.७९.४
भावार्थ :