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Rigveda / 1 / 142 / 11

अ॒व॒सृ॒जन्नुप॒ त्मना॑ दे॒वान्य॑क्षि वनस्पते। अ॒ग्निर्ह॒व्या सु॑षूदति दे॒वो दे॒वेषु॒ मेधि॑रः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 142 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : वनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : अ॒व॒ऽसृ॒जन्। उप॑। त्मना॑। दे॒वान्। य॒क्षि॒। व॒न॒स्प॒ते॒। अ॒ग्निः। ह॒व्या। सु॒सू॒द॒ति॒। दे॒वः। दे॒वेषु॑। मेधि॑रः ॥ १.१४२.११

पदार्थ : हे (वनस्पते) रश्मियों के पति सूर्य्य के समान वर्त्तमान ! आप जिस कारण (त्मना) आत्मा से (देवान्) विद्या की कामना करते हुओं को (उपावसृजन्) अपने समीप नाना प्रकार की विद्या से परिपूरित करते हुए (देवेषु) प्रकाशमान लोकों में (देवः) अत्यन्त दीपते हुए (मेधिरः) सङ्ग करानेवाले (अग्निः) जैसे अग्नि (हव्या) होम से देने योग्य पदार्थों को (सुषूदति) सुन्दरता से ग्रहण कर परमाणुरूप करता है वैसे विद्या का (यक्षि) सङ्ग करते हो। इससे सत्कार करने योग्य हो ॥ ११ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्यमण्डल पृथिवी आदि दिव्य पदार्थों में दिव्यरूप हुआ जल को वर्षाता है, वैसे विद्वान् जन संसार में विद्यार्थियों में विद्या की वर्षा करावें ॥ ११ ॥