Rigveda / 7 / 82 / 9
अ॒स्माक॑मिन्द्रावरुणा॒ भरे॑भरे पुरोयो॒धा भ॑वतं कृष्ट्योजसा । यद्वां॒ हव॑न्त उ॒भये॒ अध॑ स्पृ॒धि नर॑स्तो॒कस्य॒ तन॑यस्य सा॒तिषु॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 82 | Mantra No : 9
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : indraavaruNau | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : asmaakamindraavaruNaa bharebhare puroyodhaa bhavata.m kRRiShTyojasaa . yadvaa.m havanta ubhaye adha spRRidhi narastokasya tanayasya saatiShu .
Component Words : asmaakam . indraavaruNaa . bhare.abhare . puraH.ayodhaa . bhavatam . kRRiShTi.aojasaa . yat . vaam . havante . ubhaye . adha . spRRidhi . naraH . tokasya . tanayasya . saatiShu . 7.82.9
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्रावरुणौ | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : अ॒स्माक॑म् । इ॒न्द्रा॒व॒रु॒णा॒ । भरे॑ऽभरे । पु॒रः॒ऽयो॒धा । भ॒व॒त॒म् । कृ॒ष्टि॒ऽओ॒ज॒सा॒ । यत् । वा॒म् । हव॑न्ते । उ॒भये॑ । अध॑ । स्पृ॒धि । नरः॑ । तो॒कस्य॑ । तन॑यस्य । सा॒तिषु॑ ॥ ७.८२.९
पदार्थ : (इन्द्रावरुणा) हे विद्वानों ! तुम (भरे भरे) प्रत्येक संग्राम में (अस्माकं) हमारे (पुरोयोधा) सम्मुख (भवतं) होओ, (कृष्ट्योजसा) हे शत्रुओं के नाशक बलवालो ! (यत्) जो (नरः) नेतारः (वां) तुम्हारा (स्पृधि) युद्ध में (तोकस्य, तनयस्य, सातिषु) पुत्र-पौत्र की रक्षा के निमित्त (हवन्ते) आह्वान करते हैं, तुम उनकी रक्षा करो ॥९॥
भावार्थ : परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वानों ! तुम प्रत्येक संग्राम में मेरे सम्मुख होओ अर्थात् मुझसे विजयप्राप्ति के लिए प्रार्थना करो, क्योंकि मेरी सहायता के बिना कोई किसी को जय नहीं कर सकता। हे बड़े बलवान् योद्धाओं ! जो तुम्हारे साथ ईर्ष्या करते हैं, वे भी अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए है, परन्तु प्रजा और धर्म की रक्षा करना तुम्हारा मुख्य कर्त्तव्य होने से तुम किसी का पक्षपात मत करो, सदा राजधर्म का पालन करना और राजा की आज्ञा में सदैव रहना तुम्हारा धर्म है, जिसका अनुष्ठान करते हुए परमात्मा के समीपी होओ ॥९॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्रावरुणौ | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : अ॒स्माक॑म् । इ॒न्द्रा॒व॒रु॒णा॒ । भरे॑ऽभरे । पु॒रः॒ऽयो॒धा । भ॒व॒त॒म् । कृ॒ष्टि॒ऽओ॒ज॒सा॒ । यत् । वा॒म् । हव॑न्ते । उ॒भये॑ । अध॑ । स्पृ॒धि । नरः॑ । तो॒कस्य॑ । तन॑यस्य । सा॒तिषु॑ ॥ ७.८२.९
भावार्थ :