Rigveda / 7 / 90 / 1
प्र वी॑र॒या शुच॑यो दद्रिरे वामध्व॒र्युभि॒र्मधु॑मन्तः सु॒तास॑: । वह॑ वायो नि॒युतो॑ या॒ह्यच्छा॒ पिबा॑ सु॒तस्यान्ध॑सो॒ मदा॑य ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 90 | Mantra No : 1
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : vaayu: | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : pra viirayaa shuchayo dadrire vaamadhvaryubhirmadhumantaH sutaasaH . vaha vaayo niyuto yaahyachChaa pibaa sutasyaandhaso madaaya .
Component Words : pra . viira.ayaa . shuchayaH . dadriH . vaam . adhvaryu.abhiH . madhu.amantaH . sutaasaH . vaha . vaayo iti . ni.ayutaH . yaahi . achCha . piba . sutasya . andhasaH . madaaya . 7.90.1
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : वायु: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अब वायुविद्या को जाननेवाले विद्वान् का ऐश्वर्य्य वर्णन करते हैं।
पदपाठ : प्र । वी॒र॒ऽया । शुच॑यः । द॒द्रिः॒ । वा॒म् । अ॒ध्व॒र्युऽभिः॑ । मधु॑ऽमन्तः । सु॒तासः॑ । वह॑ । वा॒यो॒ इति॑ । नि॒ऽयुतः॑ । या॒हि॒ । अच्छ॑ । पिब॑ । सु॒तस्य॑ । अन्ध॑सः । मदा॑य ॥ ७.९०.१
पदार्थ : (वायो) हे वायुविद्या के वेत्ता विद्वान् ! आप (सुतस्य) संस्कार किये हुए (अन्धसः) अन्नों के रसों को मदाय) आह्लाद के लिये (पिब) पियें और (नियुतः) अपने पद पर नियुक्त हुए (अच्छ) भली प्रकार (वह) सर्वत्र प्राप्त होओ तथा (याहि) बिना रोक-टोक से सर्वत्र जाओ, क्योंकि (प्र) भलीभाँति (वीरया) वीरता के लिये (वाम्) तुमको (अध्वर्युभिः) वैदिक लोगों ने (मधुमन्तः) मीठे (सुतासः) सुन्दर-सुन्दर (शुचयः) पवित्र (दद्रिरे) उपदेश दिये हैं ॥१॥
भावार्थ : परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे वायुतत्त्व की विद्या को जाननेवाले विद्वान् पुरुषो ! आप वैदिक पुरुषों से उपदेश-लाभ करके सर्वत्र भूमण्डल में अव्याहतगति होकर विचरें ॥१॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : वायु: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अथ वायुविद्याविदुष ऐश्वर्यं वर्ण्यते।
पदपाठ : प्र । वी॒र॒ऽया । शुच॑यः । द॒द्रिः॒ । वा॒म् । अ॒ध्व॒र्युऽभिः॑ । मधु॑ऽमन्तः । सु॒तासः॑ । वह॑ । वा॒यो॒ इति॑ । नि॒ऽयुतः॑ । या॒हि॒ । अच्छ॑ । पिब॑ । सु॒तस्य॑ । अन्ध॑सः । मदा॑य ॥ ७.९०.१
भावार्थ :