Rigveda / 7 / 90 / 5
ते स॒त्येन॒ मन॑सा॒ दीध्या॑ना॒: स्वेन॑ यु॒क्तास॒: क्रतु॑ना वहन्ति । इन्द्र॑वायू वीर॒वाहं॒ रथं॑ वामीशा॒नयो॑र॒भि पृक्ष॑: सचन्ते ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 90 | Mantra No : 5
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : indravaayuu | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : te satyena manasaa diidhyaanaaH svena yuktaasaH kratunaa vahanti . indravaayuu viiravaaha.m ratha.m vaamiishaanayorabhi pRRikShaH sachante .
Component Words : te . satyena . manasaa . diidhyaanaaH . svena . yuktaasaH . kratunaa . vahanti . indravaayuu iti . viira.avaaham . ratham . vaam . iishaanayoH . abhi . pRRikShaH . sachante . 7.90.5
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्रवायू | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अब विद्युद्विद्यावेत्ता और वायुविद्यावेत्ता दोनों प्रकार को विद्यावेत्ता विद्वानों के गुण वर्णन करते हैं।
पदपाठ : ते । स॒त्येन । मन॑सा । दीध्या॑नाः । स्वेन॑ । यु॒क्तासः॑ । क्रतु॑ना । व॒ह॒न्ति॒ । इन्द्र॑वायू॒ इति॑ । वी॒र॒ऽवाह॑म् । रथ॑म् । वा॒म् । ई॒शा॒नयोः॑ । अ॒भि । पृक्षः॑ । स॒च॒न्ते॒ ॥ ७.९०.५
पदार्थ : (इन्द्रवायू) हे विद्युत् और वायुविद्या को जाननेवाले विद्वानों ! (वाम्) आप लोगों को (ईशानाय) जो ईश्वर की विद्या जाननेवाले हैं, आपको अभी चारों ओर से (पृक्षः) ऐश्वर्य्य (सचन्ते) संगत होते हैं और आपके बनाये हुए (रथं) यान (वीरवाहम्) वीरता को प्राप्त करनेवाले होते हैं और (ते) वे (सत्येन) सत्य (मनसा) मन से (दीध्यानाः) दीप्त हुए (स्वेन युक्तासः) ऐश्वर्य्य के साथ जुड़े हुए (क्रतुना) यज्ञों द्वारा (वहन्ति) उत्तम ऐश्वर्य्य को प्राप्त कराते हैं ॥५॥
भावार्थ : परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों ! विद्युत् विद्या के जाननेवाले तथा वायु आदि सूक्ष्म तत्त्वों के जाननेवाले विद्वान् जिन यानों को बनाते हैं, वे यान उत्तम से उत्तम ऐश्वर्यों को प्राप्त कराते हैं और वीर लोगों को नभोमण्डल में ले जानेवाले एकमात्र वही यान कहला सकते हैं, अन्य नहीं ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्रवायू | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अथ विद्युद्वाय्वोरुभयोर्विद्वांसो वर्ण्यन्ते।
पदपाठ : ते । स॒त्येन । मन॑सा । दीध्या॑नाः । स्वेन॑ । यु॒क्तासः॑ । क्रतु॑ना । व॒ह॒न्ति॒ । इन्द्र॑वायू॒ इति॑ । वी॒र॒ऽवाह॑म् । रथ॑म् । वा॒म् । ई॒शा॒नयोः॑ । अ॒भि । पृक्षः॑ । स॒च॒न्ते॒ ॥ ७.९०.५
भावार्थ :