Rigveda / 7 / 93 / 7
सो अ॑ग्न ए॒ना नम॑सा॒ समि॒द्धोऽच्छा॑ मि॒त्रं वरु॑ण॒मिन्द्रं॑ वोचेः । यत्सी॒माग॑श्चकृ॒मा तत्सु मृ॑ळ॒ तद॑र्य॒मादि॑तिः शिश्रथन्तु ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 93 | Mantra No : 7
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : indraagnii | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : so agna enaa namasaa samiddho.achChaa mitra.m varuNamindra.m vocheH . yatsiimaagashchakRRimaa tatsu mRRiLa tadaryamaaditiH shishrathantu .
Component Words : saH . agne . enaa . namasaa . sam.aiddhaH . achCha . mitram . varuNam . indram . vocheH . yat . siim . aagaH . chakRRima . tat . su . mRRiLa . tat . aryamaa . aditiH . shishrathantu . 7.93.7
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : सः । अ॒ग्ने॒ । ए॒ना । नम॑सा । स॒म्ऽइ॒द्धः । अच्छ॑ । मि॒त्रम् । वरु॑णम् । इन्द्र॑म् । वो॒चेः॒ । यत् । सी॒म् । आगः॑ । च॒कृ॒म । तत् । सु । मृ॒ळ॒ । तत् । अ॒र्य॒मा । अदि॑तिः । शि॒श्र॒थ॒न्तु॒ ॥ ७.९३.७
पदार्थ : (अग्ने) हे ज्ञानस्वरूप परमात्मन् ! (सः) आप (नमसा) विनय से (समिद्धः) प्रसन्न हुए (इन्द्रं, मित्रं, वरुणं) श्रेष्ठ अध्यापक और उपदेशक को (अच्छ, वोचेः) यह श्रेष्ठ उपदेश करो कि वे लोग यजमानों से पापकर्म्मों को (शिश्रथन्तु) वियुक्त करें और (यत्) जो (सीं) कुछ हम ने (आगः) पापकर्म्म (चकृम) किये हैं, (तत्) वह (सुमृळ) दूर करें और उनकी निवृत्ति हम (अर्य्यमा) न्यायकारी और (अदितिः) अखण्डनीय परमात्मा मे न्यायपूर्वक चाहते हैं ॥७॥
भावार्थ : पापों की निवृत्ति पश्चात्ताप से होती है, परमात्मा जिस पर अपनी कृपा करते हैं, वही पुरुष अपने मन से पापों की निवृत्ति के लिये प्रार्थना करता है अर्थात् मनुष्य में परमात्मा की कृपा से विनीतभाव आता है, अन्यथा नहीं। यहाँ सञ्चित और क्रियमाण कर्म्मों की निवृत्ति से तात्पर्य्य है, प्रारब्ध कर्म्मों से नहीं ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : सः । अ॒ग्ने॒ । ए॒ना । नम॑सा । स॒म्ऽइ॒द्धः । अच्छ॑ । मि॒त्रम् । वरु॑णम् । इन्द्र॑म् । वो॒चेः॒ । यत् । सी॒म् । आगः॑ । च॒कृ॒म । तत् । सु । मृ॒ळ॒ । तत् । अ॒र्य॒मा । अदि॑तिः । शि॒श्र॒थ॒न्तु॒ ॥ ७.९३.७
भावार्थ :