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Rigveda / 7 / 95 / 3

स वा॑वृधे॒ नर्यो॒ योष॑णासु॒ वृषा॒ शिशु॑र्वृष॒भो य॒ज्ञिया॑सु । स वा॒जिनं॑ म॒घव॑द्भ्यो दधाति॒ वि सा॒तये॑ त॒न्वं॑ मामृजीत ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 95 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : सरस्वान् | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब प्रसङ्गसङ्गति से पूर्वोक्त आध्यात्मिक विद्यारूप सरस्वती का ज्ञानरूप से कथन करते हैं।

पदपाठ : सः । व॒वृ॒धे॒ । नर्यः॑ । योष॑णासु । वृषा॑ । शिशुः॑ । वृ॒ष॒भः । य॒ज्ञिया॑सु । सः । वा॒जिन॑म् । म॒घव॑त्ऽभ्यः । द॒धा॒ति॒ । वि । सा॒तये॑ । त॒न्व॑म् । म॒मृ॒जी॒त॒ ॥ ७.९५.३

पदार्थ : (सः) वह बोध (नर्यः) मनुष्यों के लिए और (योषणासु) स्त्रियों के लिए (वावृधे) वृद्धि को प्राप्त हुआ है और वह बोध (यज्ञियासु) यज्ञीय बुद्धिरूपी भूमियों में (वृषा) वृष्टि करनेवाला है और (शिशुः) अज्ञानादिकों का छेदन करनेवाला है, “श्यति अज्ञानादिकमिति शिशुः” “शो तनूकरणे”, (वृषभः) और आध्यात्मिक आनन्दों की वृष्टि करनेवाला है और वही (मघवद्भ्यः) याज्ञिक लोगों को (वाजिनं) बल (दधाति) देता है और (सातये) युद्ध के लिये (तन्वं) शरीर को (विमामृजीत) मार्जन करता है ॥३॥

भावार्थ : सरस्वती विद्या से उत्पन्न हुआ प्रबोधरूप पुत्र स्त्री-पुरुष को संस्कार करके देवता बनाता है और यज्ञकर्मा लोगों को याज्ञिक बनाता है। बहुत क्या, जो युद्धों में आत्मत्याग करके शूरवीर बनते हैं, उनको इतने साहसी और निर्भीक एकमात्र सरस्वती विद्या से उत्पन्न हुआ प्रबोधरूप पुत्र ही शूरवीर बनाता है, अन्य नहीं ॥३॥