Rigveda / 7 / 100 / 1
नू मर्तो॑ दयते सनि॒ष्यन्यो विष्ण॑व उरुगा॒याय॒ दाश॑त् । प्र यः स॒त्राचा॒ मन॑सा॒ यजा॑त ए॒ताव॑न्तं॒ नर्य॑मा॒विवा॑सात् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 100 | Mantra No : 1
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : viShNuH | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : nuu marto dayate saniShyanyo viShNava urugaayaaya daashat . pra yaH satraachaa manasaa yajaata etaavanta.m naryamaavivaasaat .
Component Words : nu . martaH . dayate . saniShyan . yaH . viShNave . uru.agaayaaya . daashat . pra . yaH . satraachaa . manasaa . yajaate . etaavantam . naryam . aa.avivaasaat . 7.100.1
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : विष्णुः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अब परमात्मा सुमति अर्थात् शुभ नीति का उपदेश करते हैं।
पदपाठ : नु । मर्तः॑ । द॒य॒ते॒ । स॒नि॒ष्यन् । यः । विष्ण॑वे । उ॒रु॒ऽगा॒याय॑ । दाश॑त् । प्र । यः । स॒त्राचा॑ । मन॑सा । यजा॑ते । ए॒ताव॑न्तम् । नर्य॑म् । आ॒ऽविवा॑सात् ॥ ७.१००.१
पदार्थ : (यः) जो पुरुष (उरुगायाय) अत्यन्त भजनीय (विष्णवे) व्यापक परमात्मा की (सनिष्यन्) प्राप्ति के लिये इच्छा (दशत्) करते हैं, (नु) शीघ्र ही वे मनुष्य उसको (दयते) प्राप्त होते हैं और जो (सत्राचा) शुद्ध मन से (यजाते) उस परमात्मा की उपासना करता है, वह (एतावन्तं, नर्य्यं) उक्त परमात्मा का जो सब प्राणिमात्र का हित करनेवाला है (आविवासात्) अवश्यमेव प्राप्त होता है ॥१॥
भावार्थ : परमात्मप्राप्ति के लिये सबसे प्रथम जिज्ञासा अर्थात् प्रबल इच्छा उत्पन्न होनी चाहिये। तदनन्तर जो पुरुष निष्कपटभाव से परमात्मपरायण होता है, उस पुरुष को परमात्मा का साक्षात्कार अर्थात् यथार्थ ज्ञान अवश्यमेव होता है ॥१॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : विष्णुः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अथ परमात्मना सुमतिरुपदिश्यते।
पदपाठ : नु । मर्तः॑ । द॒य॒ते॒ । स॒नि॒ष्यन् । यः । विष्ण॑वे । उ॒रु॒ऽगा॒याय॑ । दाश॑त् । प्र । यः । स॒त्राचा॑ । मन॑सा । यजा॑ते । ए॒ताव॑न्तम् । नर्य॑म् । आ॒ऽविवा॑सात् ॥ ७.१००.१
भावार्थ :