Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 7 / 101 / 3

स्त॒रीरु॑ त्व॒द्भव॑ति॒ सूत॑ उ त्वद्यथाव॒शं त॒न्वं॑ चक्र ए॒षः । पि॒तुः पय॒: प्रति॑ गृभ्णाति मा॒ता तेन॑ पि॒ता व॑र्धते॒ तेन॑ पु॒त्रः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 101 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः कुमारो वाग्नेयः | देवता : पर्जन्यः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब पर्जन्य को धेनुरूप से वर्णन करते हैं।

पदपाठ : स्त॒रीः । ऊँ॒ इति॑ । त्व॒त् । भव॑ति । सूतः॑ । ऊँ॒ इति॑ । त्व॒त् । य॒था॒ऽव॒शम् । त॒न्व॑म् । च॒क्रे॒ । ए॒षः । पि॒तुः । पयः॑ । प्रति॑ । गृ॒भ्णा॒ति॒ । मा॒ता । तेन॑ । पि॒ता । व॒र्ध॒ते॒ । तेन॑ । पु॒त्रः ॥ ७.१०१.३

पदार्थ : (त्वत्) एक तो मेघ (स्तरीः) नवप्रसूता धेनु के समान (उ) निश्चय करके (भवति) होता है और (सूते) जल को वर्षता है, (त्वत्) अन्य (एषः) यह (यथावशम्) स्वेच्छापूर्वक (तन्वम्) शरीर को (चक्रे) बना लेता है, (पितुः) पितारूप द्युलोक से (माता, पयः प्रति, गृभ्णाति) मातारूप पृथिवी जल को ग्रहण करती है, (तेन) और तिससे (पिता, वर्धते) द्युलोक वृद्धि को प्राप्त होता है, (तेन) और तिससे (पुत्रः) प्राणिसङ्घरूप पुत्र भी बढ़ता है ॥३॥

भावार्थ : वर्षाऋतु में मेघ नवप्रसूता गौ के समान अपने दुग्धरूपी पयःपुञ्ज से संसार को परिपूर्ण कर देता है, वा यों कहो कि द्यु पिता और पृथिवी मातास्थानी बनकर वर्षाऋतु में नाना प्रकार की  सम्पत्ति उत्पन्न करते हैं और जो यहाँ पितास्थानी द्युलोक का बढ़ना कथन किया गया है, वह उसके ऐश्वर्य के भाव से है, कुछ आकारवृद्धि के अभिप्राय से नहीं ॥३॥