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Rigveda / 7 / 104 / 7

प्रति॑ स्मरेथां तु॒जय॑द्भि॒रेवै॑र्ह॒तं द्रु॒हो र॒क्षसो॑ भङ्गु॒राव॑तः । इन्द्रा॑सोमा दु॒ष्कृते॒ मा सु॒गं भू॒द्यो न॑: क॒दा चि॑दभि॒दास॑ति द्रु॒हा ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 104 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्रासोमौ रक्षोहणी | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : प्रति॑ । स्म॒रे॒था॒म् । तु॒जय॑त्ऽभिः । एवैः॑ । ह॒तम् । द्रु॒हः । र॒क्षसः॑ । भ॒ङ्गु॒रऽव॑तः । इन्द्रा॑सोमा । दुः॒ऽकृते॑ । मा । सु॒ऽगम् । भू॒त् । यः । नः॒ । क॒दा । चि॒त् । अ॒भि॒ऽदास॑ति । द्रु॒हा ॥ ७.१०४.७

पदार्थ : (इन्द्रासोमा) हे विद्युच्छक्तिप्रधान और सौम्यस्वभावप्रधान अर्थात् दण्डशक्ति और सौम्यस्वभावप्रधान परमात्मन् ! आप (दुष्कृते) दुष्कर्मी पुरुष के लिये (मा, सुगम्, भूत्) सुखकारी मत हों और जो (नः) हम सदाचारी पुरुषों के काम में (कदाचित्) कभी (द्रुहा) दुष्टता से (अभिदासति) बाधा डालता है (भङ्गुरावतः) जो क्रूर तथा (द्रुहः) दुष्ट कर्म करनेवाले (रक्षसः) राक्षस हैं, उनको (तुजयद्भिः) जो कि अति पीड़ा देनेवाले हैं, (एवैः) ऐसी शक्तियों से (हतम्) नाश करें, आप इस प्रार्थना को (प्रति, स्मरेथाम्) स्वीकार करें ॥७॥

भावार्थ : दुष्टाचारी अन्यायकारियों के प्रति दण्ड देने का विधान इस मन्त्र में किया गया है। तात्पर्य यह है कि जो पुरुष क्रूरप्रकृति हैं, वे यथायोग्य दण्ड के अधिकारी होते हैं, क्षमा के नहीं ॥७॥