Rigveda / 7 / 104 / 23
मा नो॒ रक्षो॑ अ॒भि न॑ड्यातु॒माव॑ता॒मपो॑च्छतु मिथु॒ना या कि॑मी॒दिना॑ । पृ॒थि॒वी न॒: पार्थि॑वात्पा॒त्वंह॑सो॒ऽन्तरि॑क्षं दि॒व्यात्पा॑त्व॒स्मान् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 104 | Mantra No : 23
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : vashiShThaH pRRithivyantarikShe | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : maa no rakSho abhi naDyaatumaavataamapochChatu mithunaa yaa kimiidinaa . pRRithivii naH paarthivaatpaatva.mhaso.antarikSha.m divyaatpaatvasmaan .
Component Words : maa . naH . rakShaH . abhi . naT . yaatu.amaavataam . apa . uchChatu . mithunaa . yaa . kimiidinaa . pRRithivii . naH . paarthivaat . paatu . a.mhasaH . antarikSham . divyaat . paatu . asmaan . 7.104.23
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : वशिष्ठः पृथिव्यन्तरिक्षे | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : मा । नः॒ । रक्षः॑ । अ॒भि । न॒ट् । या॒तु॒ऽमाव॑ताम् । अप॑ । उ॒च्छ॒तु॒ । मि॒थु॒ना । या । कि॒मी॒दिना॑ । पृ॒थि॒वी । नः॒ । पार्थि॑वात् । पा॒तु॒ । अंह॑सः । अ॒न्तरि॑क्षम् । दि॒व्यात् । पा॒तु॒ । अ॒स्मान् ॥ ७.१०४.२३
पदार्थ : (या, किमिदिना) जो “किमिदम् किमिदम् इति वादिनः” ईश्वर के ज्ञान में संशय करनेवाले अर्थात् ये क्या है, ये क्या है, ऐसा संशय उत्पन्न करनेवाले और (यातुमावतां, मिथुना) राक्षसों के यूथ=जत्थे हैं, (अपोच्छतु) वे हमसे दूर हो जायँ, (मा, नः, रक्षः, अभिनट्) ऐसे राक्षस हम पर आक्रमण न करें और (पृथिवी) भूमि (पार्थिवात्, अंहसः) पार्थिव पदार्थों की अपवित्रता से (नः) हमारी (पातु) रक्षा करे, (दिव्यात्) द्युभव पदार्थों से (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष (अस्मान्, पातु) हमारी रक्षा करे ॥२३॥
भावार्थ : तात्पर्य यह है कि आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक तीनों प्रकार के तापों से हम सर्वथा वर्जित रहें अर्थात् पार्थिक शरीर में कोई आधिभौतिक ताप न हो और अन्तरिक्ष से हमें कोई आधिभौतिक ताप न व्यापे और मानस तापों के मूलभूत अन्यायकारी राक्षसों का विध्वंस होने से हमें कोई मानस ताप न व्याप्त हो और जो पृथिवी तथा अन्तरिक्ष से रक्षा का कथन है, वह तापनिवृत्ति के अभिप्राय से औपचारिक है, मुख्य नहीं ॥२३॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : वशिष्ठः पृथिव्यन्तरिक्षे | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : मा । नः॒ । रक्षः॑ । अ॒भि । न॒ट् । या॒तु॒ऽमाव॑ताम् । अप॑ । उ॒च्छ॒तु॒ । मि॒थु॒ना । या । कि॒मी॒दिना॑ । पृ॒थि॒वी । नः॒ । पार्थि॑वात् । पा॒तु॒ । अंह॑सः । अ॒न्तरि॑क्षम् । दि॒व्यात् । पा॒तु॒ । अ॒स्मान् ॥ ७.१०४.२३
भावार्थ :