Rigveda / 8 / 1 / 2
अ॒व॒क्र॒क्षिणं॑ वृष॒भं य॑था॒जुरं॒ गां न च॑र्षणी॒सह॑म् । वि॒द्वेष॑णं सं॒वन॑नोभयंक॒रं मंहि॑ष्ठमुभया॒विन॑म् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 1 | Mantra No : 2
In English:
Seer : pragaatho ghauraH kaaNvo vaa | Devta : indra: | Metre : bhurigaarShiibRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : avakrakShiNa.m vRRiShabha.m yathaajura.m gaa.m na charShaNiisaham . vidveShaNa.m sa.mvananobhaya.mkara.m ma.mhiShThamubhayaavinam .
Component Words : ava.akrakShiNam . vRRiShabham . yathaa . ajuram . gaam . na . charShaNi.asaham . vi.adveShaNam . sam.avananaa . ubhayam.akaram . ma.mhiShTham . ubhayaavinam . 8.1.2
In Hindi:
ऋषि : प्रगाथो घौरः काण्वो वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिगार्षीबृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अब परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करते हैं।
पदपाठ : अ॒व॒ऽक्र॒क्षिण॑म् । वृ॒ष॒भम् । य॒था॒ । अ॒जुर॑म् । गाम् । न । च॒र्ष॒णि॒ऽसह॑म् । वि॒ऽद्वेष॑णम् । स॒म्ऽवन॑ना । उ॒भ॒य॒म्ऽक॒रम् । मंहि॑ष्ठम् । उ॒भ॒या॒विन॑म् ॥ ८.१.२
पदार्थ : (वृषभं, यथा, अवक्रक्षिणं) मेघ के समान अवकर्षण शक्तिवाला (अजुरं) जरारहित (गां, न) पृथिवी के समान (चर्षणिसहं) मनुष्यों के कर्मों को सहनेवाला (विद्वेषणं) दुश्चरित्र मनुष्यों का द्वेष्टा (संवनना) सम्यग् भजनीय (उभयंकरं) निग्रहानुग्रह करनेवाला (मंहिष्ठं) सब कामनाओं का पूर्ण करनेवाला (उभयाविनं) जीव और प्रकृति का स्वामी परमात्मा उपासनीय है ॥२॥
भावार्थ : इस मन्त्र में गुणगुणिभाव से परमात्मा का स्वरूपवर्णन किया गया है कि वह परमात्मा अजर, अमर, अभय, नित्यपवित्र, सब मनुष्यों के कर्मों का द्रष्टा और जो सदाचारी मनुष्यों को सद्गति का प्रदाता है, वही मनुष्यमात्र का उपासनीय है । मन्त्र में लोकप्रसिद्ध मेघादिकों के दृष्टान्त इस अभिप्राय से कथन किये हैं कि साधारण पुरुष भी उसके गुणगौरव को जानकर उसकी स्तुति तथा उपासना करें, इस मन्त्र की व्याख्या शतपथ में इस प्रकार की है किः− एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम् । विजरः पर आकाशादयमात्मा महान् ध्रुवः ॥उसके जानने का एक ही प्रकार है कि वह जरादि अवस्थाओं से रहित महानात्मा आकाश से भी परे है, तात्पर्य्य यह है कि वैदिक लोग “दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्वः” ऋग्० ८ । ८ । ४८ । ३ इत्यादि मन्त्रों के प्रमाण द्वारा आकाश को एकदेशी और उत्पत्तिवाला मानते हैं, ईश्वर के समान सर्वव्यापक नहीं । इसी अभिप्राय से परमात्मा को आकाश से भी परे कहा है ॥भाव यह है कि सब पदार्थों का निर्माता और अधिष्ठाता एकमात्र परमात्मा ही है और उसी की उपासना करना मनुष्यमात्र को उचित है ॥
In Sanskrit:
ऋषि : प्रगाथो घौरः काण्वो वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिगार्षीबृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अथ ईश्वरस्वरूपं वर्ण्यते।
पदपाठ : अ॒व॒ऽक्र॒क्षिण॑म् । वृ॒ष॒भम् । य॒था॒ । अ॒जुर॑म् । गाम् । न । च॒र्ष॒णि॒ऽसह॑म् । वि॒ऽद्वेष॑णम् । स॒म्ऽवन॑ना । उ॒भ॒य॒म्ऽक॒रम् । मंहि॑ष्ठम् । उ॒भ॒या॒विन॑म् ॥ ८.१.२
भावार्थ :