Rigveda / 8 / 1 / 18
अध॒ ज्मो अध॑ वा दि॒वो बृ॑ह॒तो रो॑च॒नादधि॑ । अ॒या व॑र्धस्व त॒न्वा॑ गि॒रा ममा जा॒ता सु॑क्रतो पृण ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 1 | Mantra No : 18
In English:
Seer : medhaatithimedhyaatithii kaaNvau | Devta : indra: | Metre : viraaDbRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : adha jmo adha vaa divo bRRihato rochanaadadhi . ayaa vardhasva tanvaa giraa mamaa jaataa sukrato pRRiNa .
Component Words : adha . jmaH . adha . vaa . divaH . bRRihataH . rochanaat . adhi . ayaa . vardhasva . tanvaa . giraa . mama . aa . jaataa . sukrato iti su.akrato . pRRiNa . 8.1.18
In Hindi:
ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अब सर्वनियन्ता परमात्मा से वृद्धि की प्रार्थना कथन करते हैं।
पदपाठ : अध॑ । ज्मः । अध॑ । वा॒ । दि॒वः । बृ॒ह॒तः । रो॒च॒नात् । अधि॑ । अ॒या । व॒र्ध॒स्व॒ । त॒न्वा॑ । गि॒रा । मम॑ । आ । जा॒ता । सु॒क्र॒तो॒ इति॑ सुऽक्रतो । पृ॒ण॒ ॥ ८.१.१८
पदार्थ : (अध) हे परमात्मन् ! इस समय (ज्मः) पृथिवी (वा) और (बृहतः) महान् (रोचनात्) दीप्यमान (दिवः) अन्तरिक्षलोकपर्य्यन्त (अधि) अधिष्ठित आप (अया) इस (तन्वा) विस्तृत (गिरा) स्तुतिवाणी से (वर्धस्व) हृदयाकाश में वृद्धि को प्राप्त हों। (सुक्रतो) हे सुन्दरकर्मवाले प्रभो ! (मम) मेरी (जाता) उत्पन्न हुई सन्तान को (आपृण) उत्तम फलयुक्त करके तृप्त करें ॥१८॥
भावार्थ : भाव यह है कि इस मन्त्र में अन्तरिक्षादि लोकों में भी व्यापक, सर्वरक्षक तथा सर्वनियन्ता परमात्मा से यह प्रार्थनाकथन किया है कि हे प्रभो ! आप हमारे हृदय में विराजमान हों और हमारे ऐश्वर्य की वृद्धि तथा हमारी सन्तान को उत्तम फल प्रदान करें, जिससे वे संसार में सुख-सम्पत्ति को प्राप्त हों ॥१८ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अथ परमात्मनः स्वाभ्युदयः प्रार्थ्यते।
पदपाठ : अध॑ । ज्मः । अध॑ । वा॒ । दि॒वः । बृ॒ह॒तः । रो॒च॒नात् । अधि॑ । अ॒या । व॒र्ध॒स्व॒ । त॒न्वा॑ । गि॒रा । मम॑ । आ । जा॒ता । सु॒क्र॒तो॒ इति॑ सुऽक्रतो । पृ॒ण॒ ॥ ८.१.१८
भावार्थ :