Rigveda / 8 / 1 / 20
मा त्वा॒ सोम॑स्य॒ गल्द॑या॒ सदा॒ याच॑न्न॒हं गि॒रा । भूर्णिं॑ मृ॒गं न सव॑नेषु चुक्रुधं॒ क ईशा॑नं॒ न या॑चिषत् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 1 | Mantra No : 20
In English:
Seer : medhaatithimedhyaatithii kaaNvau | Devta : indra: | Metre : aarShiibRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : maa tvaa somasya galdayaa sadaa yaachannaha.m giraa . bhuurNi.m mRRiga.m na savaneShu chukrudha.m ka iishaana.m na yaachiShat .
Component Words : maa . tvaa . somasya . galdayaa . sadaa . yaachan . aham . giraa . bhuurNim . mRRigam . na . savaneShu . chukrudham . kaH . iishaanam . na . yaachiShat . 8.1.20
In Hindi:
ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीबृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अब उपदेशकों को परमात्मा का प्रेमसहित उपदेश करना कथन करते हैं।
पदपाठ : मा । त्वा॒ । सोम॑स्य । गल्द॑या । सदा॑ । याच॑न् । अ॒हम् । गि॒रा । भूर्णि॑म् । मृ॒गम् । न । सव॑नेषु । चु॒क्रु॒ध॒म् । कः । ईशा॑नम् । न । या॒चि॒ष॒त् ॥ ८.१.२०
पदार्थ : (गिरा) स्तुतियुक्त वाणी द्वारा (सदा) सदैव (याचन्) परमात्मा की स्तुति-प्रार्थना करते हुए (सवनेषु) यज्ञों में (सोमस्य, गल्दया) परमात्मसम्बन्धी वाणी पूछने पर (त्वा) तुम पर (चुक्रुधं, मा) क्रोध मत करें, क्योंकि (भूर्णिं) सबका भरण-पोषण करनेवाले (मृगं, न) सिंहसमान (ईशानं) ईशन करनेवाले परमात्मा की (कः) कौन मनुष्य (न, याचिषत्) याचना न करेगा अर्थात् सभी पुरुष उसकी याचना करते हैं ॥२०॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपदेशक उपासकों के प्रति यह उपदेश करता है कि हे उपासको ! तुम लोग सदैव यज्ञादिकर्मों में प्रवृत्त रहो और परमात्मा की वेदरूप वाणी, जो मनुष्यमात्र के लिये कल्याणकारक है, उसमें सन्देह होने पर क्रोध न करते हुए प्रतिपक्षी को यथार्थ उत्तर दो और सबका पालन-पोषण तथा रक्षण करनेवाले परमपिता परमात्मा से ही सब कामनाओं की याचना करो । वही सबके लिये इष्टफलों का प्रदाता है । यद्यपि परमात्मा सम्पूर्ण कर्मों का फलप्रदाता है और विना कर्म किये हुए कोई भी इष्टसिद्धि को प्राप्त नहीं होता, तथापि मनुष्य अपनी न्यूनता पूर्ण करने के लिये अपने से उच्च की अभिलाषा स्वाभाविक रखता है और सर्वोपरि उच्च एकमात्र परमात्मा है, इसलिये अपनी न्यूनता पूर्ण करने के लिये उसी सर्वोपरि देव से सबको याचना करनी चाहिये ॥२० ॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीबृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अथ उपदेशकाः परमात्मानं प्रेम्णा उपदिशेयुरिति कथ्यते।
पदपाठ : मा । त्वा॒ । सोम॑स्य । गल्द॑या । सदा॑ । याच॑न् । अ॒हम् । गि॒रा । भूर्णि॑म् । मृ॒गम् । न । सव॑नेषु । चु॒क्रु॒ध॒म् । कः । ईशा॑नम् । न । या॒चि॒ष॒त् ॥ ८.१.२०
भावार्थ :