Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 8 / 1 / 31

आ यदश्वा॒न्वन॑न्वतः श्र॒द्धया॒हं रथे॑ रु॒हम् । उ॒त वा॒मस्य॒ वसु॑नश्चिकेतति॒ यो अस्ति॒ याद्व॑: प॒शुः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 1 | Mantra No : 31

In Hindi:

ऋषि : आसङ्गः प्लायोगिः | देवता : आसंङ्गस्य दानस्तुतिः | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अब कर्मयोगी ईश्वर के ऐश्वर्य्य का वर्णन करता है।

पदपाठ : आ । यत् । अश्वा॑न् । वन॑न्ऽवतः । श्र॒द्धया॑ । अ॒हम् । रथे॑ । रु॒हम् । उ॒त । वा॒मस्य॑ । वसु॑नः । चि॒के॒त॒ति॒ । यः । अस्ति॑ । याद्वः॑ । प॒शुः ॥ ८.१.३१

पदार्थ : (यत्) यदि (रथे) गतिशील प्रकृति में (वनन्वतः, अश्वान्) व्यापक शक्तिवाले पदार्थों को जानने के लिये (अहं) हम लोग (श्रद्धया) दृढ़ जिज्ञासा से (आ, रुहं) प्रवृत्त हों (उत) तो (यः) जो (याद्वः, पशुः) मनुष्यों में सूक्ष्मद्रष्टा कर्मयोगी (अस्ति) है, वह (वामस्य) सूक्ष्म=दुर्ज्ञेय (वसुनः) पदार्थों के तत्त्व को (चिकेतति) जान सकता है ॥३१॥

भावार्थ : परमात्मा की सृष्टिरूप इस अनन्त ब्रह्माण्ड में सूक्ष्म से सूक्ष्म दुर्विज्ञेय पदार्थ विद्यमान हैं, जिनको बड़े-बड़े पदार्थवेत्ता अपने ज्ञानद्वारा अनुभव करते हैं । इस मन्त्र में कर्मयोगी परमात्मा की प्रकृति को दुर्विज्ञेय कथन करता हुआ यह वर्णन करता है कि हम लोग उन पदार्थों को जानने के लिये दृढ़ जिज्ञासा से प्रवृत्त हों अर्थात् कर्मयोगी को उचित है कि वह अपने अभ्यास द्वारा उनके जानने का प्रयत्न करे, जो पुरुष सूक्ष्म से सूक्ष्म पदार्थों को जानकर उनका आविष्कार करते हैं, वे ऐश्वर्य्यशाली होकर मनुष्यजन्म के फलों को प्राप्त होते हैं ॥३१ ॥