Rigveda / 8 / 2 / 9
शुचि॑रसि पुरुनि॒ष्ठाः क्षी॒रैर्म॑ध्य॒त आशी॑र्तः । द॒ध्ना मन्दि॑ष्ठ॒: शूर॑स्य ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 2 | Mantra No : 9
In English:
Seer : medhaatithiH kaaNvaH priyamedhashchaa~NgirasaH | Devta : indra: | Metre : aarShiigaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : shuchirasi puruniShThaaH kShiirairmadhyata aashiirtaH . dadhnaa mandiShThaH shuurasya .
Component Words : shuchiH . asi . puruniH.asthaaH . kShiiraiH . madhyataH . aa.ashiirtaH . dadhnaa . mandiShThaH . shuurasya . 8.2.9
In Hindi:
ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीगायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अब वीरों के लिये बलकारक भक्ष्य पदार्थों का विधान कथन करते हैं।
पदपाठ : शुचिः॑ । अ॒सि॒ । पु॒रु॒निः॒ऽस्थाः । क्षी॒रैः । म॒ध्य॒तः । आऽशी॑र्तः । द॒ध्ना । मन्दि॑ष्ठः । शूर॑स्य ॥ ८.२.९
पदार्थ : हे आह्लादजनक उत्तम रस ! तुम (शुचिः, असि) शुद्ध हो (पुरुनिष्ठाः) अनेक कर्मयोगियों में रहनेवाले हो (क्षीरैः, दध्ना) क्षीर दध्यादि शुद्ध पदार्थों के (मध्यतः, आशीर्तः) मध्य में संस्कृत किये गये हो (शूरस्य, मन्दिष्ठः) शूरवीर कर्मयोगी के हर्ष को उत्पन्न करनेवाले हो ॥९॥
भावार्थ : इस मन्त्र में पुष्टिकारक तथा आह्लादजनक दूध-घृतादि पदार्थों की महिमा वर्णन की गई है अर्थात् कर्मयोगी शूरवीरों के अङ्ग प्रत्यङ्ग दूध, दधि तथा घृतादि शुद्ध पदार्थों से ही सुसंगठित तथा सुरूपवान् होते हैं, तमोगुण-उत्पादक मादक द्रव्यों से नहीं, इसलिये प्रत्येक पुरुष को उक्त पदार्थों का ही सेवन करना चाहिये, हिंसा से प्राप्त होनेवाले तथा मादक द्रव्यों का नहीं ॥९ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीगायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अथ वीरेभ्यो बलोत्पादकभक्ष्यपदार्था उच्यन्ते।
पदपाठ : शुचिः॑ । अ॒सि॒ । पु॒रु॒निः॒ऽस्थाः । क्षी॒रैः । म॒ध्य॒तः । आऽशी॑र्तः । द॒ध्ना । मन्दि॑ष्ठः । शूर॑स्य ॥ ८.२.९
भावार्थ :