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Rigveda / 8 / 2 / 31

ए॒वेदे॒ष तु॑विकू॒र्मिर्वाजाँ॒ एको॒ वज्र॑हस्तः । स॒नादमृ॑क्तो दयते ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 2 | Mantra No : 31

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीगायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब अन्नादि पदार्थों के सुरक्षित रखने का विधान कथन करते हैं।

पदपाठ : ए॒व । इत् । ए॒षः । तु॒वि॒ऽकू॒र्मिः । वाजा॑न् । एकः॑ । वज्र॑ऽहस्तः । स॒नात् । अमृ॑क्तः । द॒य॒ते॒ ॥ ८.२.३१

पदार्थ : (एषः, एव, इत्) यही कर्मयोगी (तुविकूर्मिः) अनेक कर्मोंवाला (एकः) एक ही (वज्रहस्तः) वज्रसमान हस्तवाला (सनात्, अमृक्तः) चिरकालपर्य्यन्त निर्विघ्न (वाजान्) अन्नादि पदार्थों को (दयते) सुरक्षित रखता है ॥३१॥

भावार्थ : इस मन्त्र का तात्पर्य्य यह है कि जिज्ञासु पुरुष कर्मयोगी की स्तुति करते हुए उसको चिरकालपर्य्यन्त अन्नादि खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखनेवाला कथन करते हैं, जिसका भाव यह है कि राजा तथा प्रजा को अन्न का कोष सदा चिरकाल तक सुरक्षित रखना चाहिये, जिससे प्रजा अन्न के कष्ट से दारुण दुःख को प्राप्त न हो । शास्त्र में “अन्नं वै प्राणः”=अन्न को प्राण कथन किया है, क्योंकि अन्न के विना प्राणी जीवित नहीं रह सकता, इसलिये पुरुषों को उचित है कि अन्न का कोश सदा सुरक्षित रखें ॥३१ ॥