Rigveda / 8 / 2 / 35
प्रभ॑र्ता॒ रथं॑ ग॒व्यन्त॑मपा॒काच्चि॒द्यमव॑ति । इ॒नो वसु॒ स हि वोळ्हा॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 2 | Mantra No : 35
In English:
Seer : medhaatithiH kaaNvaH priyamedhashchaa~NgirasaH | Devta : indra: | Metre : aarShiigaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : prabhartaa ratha.m gavyantamapaakaachchidyamavati . ino vasu sa hi voLhaa .
Component Words : pra.abhartaa . ratham . gavyantam . apaakaat . chit . yam . avati . inaH . vasu . saH . hi . voLhaa . 8.2.35
In Hindi:
ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीगायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अब कर्मयोगी अपने राष्ट्र को उत्तम मार्गों द्वारा सुसज्जित करे, यह कथन करते हैं।
पदपाठ : प्रऽभ॑र्ता । रथ॑म् । ग॒व्यन्त॑म् । अ॒पा॒कात् । चि॒त् । यम् । अव॑ति । इ॒नः । वसु॑ । सः । हि । वोळ्हा॑ ॥ ८.२.३५
पदार्थ : (प्रभर्ता) जो प्रहरणशील कर्मयोगी (अपाकात्) अपरिपक्वबुद्धिवाले तथा (चित्) अन्य से (यं, गव्यन्तं, रथं) प्रकाश की इच्छा करनेवाले जिस रथ की (अवति) रक्षा करता है (सः, हि) वही कर्मयोगी (इनः) प्रभु होकर (वसु) रत्नों का (वोळहा) धारण करनेवाला होता है ॥३५॥
भावार्थ : जो कर्मयोगी मार्गों को विस्तृत, साफ सुथरे तथा प्रकाशमय बनाता है, जिसमें रथ तथा मनुष्यादि सब आरामपूर्वक सुगमता से आ जा सकें, वही प्रभु होता और वही श्रीमान्=सब रत्नादि पदार्थों का स्वामी होता है ॥३५ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीगायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अथ कर्मयोगी स्वराष्ट्रं सुपथं कुर्यादिति कथ्यते।
पदपाठ : प्रऽभ॑र्ता । रथ॑म् । ग॒व्यन्त॑म् । अ॒पा॒कात् । चि॒त् । यम् । अव॑ति । इ॒नः । वसु॑ । सः । हि । वोळ्हा॑ ॥ ८.२.३५
भावार्थ :