Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 8 / 2 / 39

य ऋ॒ते चि॒द्गास्प॒देभ्यो॒ दात्सखा॒ नृभ्य॒: शची॑वान् । ये अ॑स्मि॒न्काम॒मश्रि॑यन् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 2 | Mantra No : 39

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीगायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब कर्मयोगी को शक्तिसम्पन्न तथा शक्तियों का प्रदाता कथन करते हैं।

पदपाठ : यः । ऋ॒ते । चि॒त् । गाः । प॒देभ्यः॑ । दात् । सखा॑ । नृऽभ्यः॑ । शची॑ऽवान् । ये । अ॒स्मि॒न् । काम॑म् । अश्रि॑यन् ॥ ८.२.३९

पदार्थ : (ये) जो पुरुष (अस्मिन्) इस कर्मयोगी में (कामं) कामनाओं को (अश्रियन्) रखते हैं, वह (नृभ्यः) उन मनुष्यों के लिये (शचीवान्) प्रशस्तक्रियावान् (सखा) हितकारक (यः) जो कर्मयोगी (पदेभ्यः, ऋते, चित्) पदवियों के विना ही (गाः) शक्तियों को (दात्) देता है ॥३९॥

भावार्थ : प्रशस्तक्रियावान् कर्मयोगी, जो सबका हितकारक, विद्यादि शुभ गुणों का प्रचारक और जिसमें सब प्रकार की शक्तियें विद्यमान हैं, वह अशक्त को भी शक्तिसम्पन्न करता और कामना करनेवाले विद्वानों के लिये पूर्णकाम होता है, जिससे वह अपने मनोरथ को सुखपूर्वक सफल कर सकते हैं ॥३९ ॥