Rigveda / 8 / 3 / 8
अ॒स्येदिन्द्रो॑ वावृधे॒ वृष्ण्यं॒ शवो॒ मदे॑ सु॒तस्य॒ विष्ण॑वि । अ॒द्या तम॑स्य महि॒मान॑मा॒यवोऽनु॑ ष्टुवन्ति पू॒र्वथा॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 3 | Mantra No : 8
In English:
Seer : medhyaatithiH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : svaraaDbRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : asyedindro vaavRRidhe vRRiShNya.m shavo made sutasya viShNavi . adyaa tamasya mahimaanamaayavo.anu ShTuvanti puurvathaa .
Component Words : asya . it . indraH . vavRRidhe . vRRiShNyam . shavaH . made . sutasya . viShNavi . adya . tam . asya . mahimaanam . aayavaH . anu . stuvanti . puurva.athaa . 8.3.8
In Hindi:
ऋषि : मेध्यातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराड्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अब कर्मयोगी के आचरण का अनुष्ठान करना कथन करते हैं।
पदपाठ : अ॒स्य । इत् । इन्द्रः॑ । व॒वृ॒धे॒ । वृष्ण्य॑म् । शवः॑ । मदे॑ । सु॒तस्य॑ । विष्ण॑वि । अ॒द्य । तम् । अ॒स्य॒ । म॒हि॒मान॑म् । आ॒यवः॑ । अनु॑ । स्तु॒व॒न्ति॒ । पू॒र्वऽथा॑ ॥ ८.३.८
पदार्थ : (इन्द्रः) कर्मयोगी (अस्य, इत्) इस स्तोता के ही (वृष्ण्यं, शवः) वीर्य्य तथा बल को (सुतस्य) संस्कृत पदार्थसेवन से (विष्णवि, मदे) शरीरव्यापक आनन्द उत्पन्न होने पर (ववृधे) बढ़ाता है (आयवः) मनुष्य (अस्य) इस कर्मयोगी के (तं, महिमानं) उस महत्त्व को (अद्य) अब भी (पूर्वथा) पहले की तरह (अनुष्टुवन्ति) यथावत् स्तवन करते हैं ॥८॥
भावार्थ : इस मन्त्र का भाव यह है कि स्तोता तथा अधिकारी जिज्ञासुजनों के बल को उत्तमोत्तम पदार्थों द्वारा कर्मयोगी बढ़ाता है, क्योंकि बलसम्पन्न पुरुष ही अपने अभीष्ट को पूर्ण कर सकता है और मनुष्य पूर्व की न्याईं अर्थात् पूर्व कल्प के समान इस कर्मयोगी के धर्माचरण का अनुष्ठान करके अब भी ऐश्वर्य्यशाली हो सकते हैं, इसलिये कर्मयोगी का स्तवन करते हुए पुरुष अनुष्ठानार्ह हों ॥८ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेध्यातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराड्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अथ जनाः कर्मसु कर्मयोगिनमनुसरन्तीति कथ्यते।
पदपाठ : अ॒स्य । इत् । इन्द्रः॑ । व॒वृ॒धे॒ । वृष्ण्य॑म् । शवः॑ । मदे॑ । सु॒तस्य॑ । विष्ण॑वि । अ॒द्य । तम् । अ॒स्य॒ । म॒हि॒मान॑म् । आ॒यवः॑ । अनु॑ । स्तु॒व॒न्ति॒ । पू॒र्वऽथा॑ ॥ ८.३.८
भावार्थ :