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Rigveda / 8 / 4 / 2

यद्वा॒ रुमे॒ रुश॑मे॒ श्याव॑के॒ कृप॒ इन्द्र॑ मा॒दय॑से॒ सचा॑ । कण्वा॑सस्त्वा॒ ब्रह्म॑भि॒: स्तोम॑वाहस॒ इन्द्रा य॑च्छ॒न्त्या ग॑हि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 4 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : देवातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : यत् । वा॒ । रुमे॑ । रुश॑मे । श्याव॑के । कृपे॑ । इन्द्र॑ । मा॒दय॑से । सचा॑ । कण्वा॑सः । त्वा॒ । ब्रह्म॑ऽभिः । स्तोम॑ऽवाहसः । इन्द्र॑ । आ । य॒च्छ॒न्ति॒ । आ । ग॒हि॒ ॥ ८.४.२

पदार्थ : (इन्द्र) हे कर्मयोगिन् ! (यद्वा) यद्यपि (रुमे) केवल शब्दमात्र करनेवाले तथा (रुशमे) तेजस्वी (श्यावके) तमोगुणवाले तथा (कृपे) समर्थ पुरुषों में (सचा) साथ ही (मादयसे) हर्ष उत्पन्न करते हैं, तथापि (स्तोमवाहसः) आपके भाग को लिये हुए (कण्वासः) विद्वान् लोग (ब्रह्मभिः) स्तुति द्वारा (त्वा) आपको (आयच्छन्ति) बुलाते हैं, (इन्द्र) हे इन्द्र ! (आगहि) आइये ॥२॥

भावार्थ : हे ऐश्वर्य्यसम्पन्न कर्मयोगिन् ! भीरु, तेजस्वी, तमोगुणी तथा सम्पत्तिशाली सब प्रकार के पुरुष आपको बुलाकर सत्कार करते और आप सबको हर्ष उत्पन्न करते हैं, सो हे भगवन् ! आपके सत्कारार्ह पदार्थ लिये हुए विद्वान् लोग स्तुतियों द्वारा आपको बुला रहे हैं । आप कृपा करके शीघ्र आइये ॥२ ॥