Rigveda / 8 / 4 / 4
मन्द॑न्तु त्वा मघवन्नि॒न्द्रेन्द॑वो राधो॒देया॑य सुन्व॒ते । आ॒मुष्या॒ सोम॑मपिबश्च॒मू सु॒तं ज्येष्ठं॒ तद्द॑धिषे॒ सह॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 4 | Mantra No : 4
In English:
Seer : devaatithiH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : nichRRitpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : mandantu tvaa maghavannindrendavo raadhodeyaaya sunvate . aamuShyaa somamapibashchamuu suta.m jyeShTha.m taddadhiShe sahaH .
Component Words : mandantu . tvaa . magha.avan . indra . indavaH . raadhaH.adayaaya . sunvate . aa.amuShya . somam . apibaH . chamuu iti . sutam . jyeShTham . tat . dadhiShe . sahaH . 8.4.4
In Hindi:
ऋषि : देवातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : अब सत्कारानन्तर कर्मयोगी की स्तुति करना कथन करते हैं।
पदपाठ : मन्द॑न्तु । त्वा॒ । म॒घ॒ऽव॒न् । इ॒न्द्र॒ । इन्द॑वः । रा॒धः॒ऽदया॑य । सु॒न्व॒ते । आ॒ऽमुष्य॑ । सोम॑म् । अ॒पि॒बः॒ । च॒मू इति॑ । सु॒तम् । ज्येष्ठ॑म् । तत् । द॒धि॒षे॒ । सहः॑ ॥ ८.४.४
पदार्थ : (मघवन्, इन्द्र) हे धनवन् इन्द्र ! (सुन्वते) जिज्ञासु को (राधोदेयाय) धन देने के लिये (इन्दवः) ये रस (त्वा) आपको (मन्दन्तु) हर्षित करें, जो आपने (आमुष्य) शत्रुओं से छीनकर (चमू) सेनाओं के मध्य में (सुतं, सोमं) सिद्ध किये हुए अपने भाग को (अपिबः) पिया, (तत्) जिससे (ज्येष्ठं) सबसे अधिक (सहः) सामर्थ्य के (दधिषे) धारयिता कहे जाते हो ॥४॥
भावार्थ : हे कर्मयोगिन् ! ये रस आपकी प्रसन्नतार्थ हम लोगों ने सिद्ध करके आपको अर्पण किये हैं । आप इनको पान करके प्रसन्न हों और हम जिज्ञासुजनों को धनादि ऐश्वर्य्य प्रदान करें । हे युद्धविद्या में कुशल शूरवीर ! आप शत्रुओं को विजय करनेवाले और उनके पदार्थों को जीतकर अपना भाग ग्रहण करनेवाले हो, इसी कारण आपको सब सामर्थ्यसम्पन्न कहते हैं ॥४ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : देवातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : अथ सत्कारानन्तरं तं स्तौति।
पदपाठ : मन्द॑न्तु । त्वा॒ । म॒घ॒ऽव॒न् । इ॒न्द्र॒ । इन्द॑वः । रा॒धः॒ऽदया॑य । सु॒न्व॒ते । आ॒ऽमुष्य॑ । सोम॑म् । अ॒पि॒बः॒ । च॒मू इति॑ । सु॒तम् । ज्येष्ठ॑म् । तत् । द॒धि॒षे॒ । सहः॑ ॥ ८.४.४
भावार्थ :