Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 8 / 4 / 6

स॒हस्रे॑णेव सचते यवी॒युधा॒ यस्त॒ आन॒ळुप॑स्तुतिम् । पु॒त्रं प्रा॑व॒र्गं कृ॑णुते सु॒वीर्ये॑ दा॒श्नोति॒ नम॑उक्तिभिः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 4 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : देवातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : स॒हस्रे॑णऽइव । स॒च॒ते॒ । य॒वि॒ऽयुधा॑ । यः । ते॒ । आन॑ट् । उप॑ऽस्तुतिम् । पु॒त्रम् । प्रा॒व॒र्गम् । कृ॒णु॒ते॒ । सु॒ऽवीर्ये॑ । दा॒श्नोति॑ । नम॑ऽउक्तिऽभिः ॥ ८.४.६

पदार्थ : (यवियुधा) वह पुरुष विद्युत् के समान युद्ध करनेवाला होकर (सहस्रेणेव) सहस्रों बलों से (सचते) संगत होता है, (यः) जो (ते) आपकी (उपस्तुतिं) अल्प स्तुति को भी (आनट्) करता है और जो (नमउक्तिभिः) नम्र वचनों से (दाश्नोति) आपका भाग देता है वह (सुवीर्ये) सुन्दर पराक्रमवाले आपकी अध्यक्षता में (पुत्रं) अपनी सन्तान को (प्रावर्गं) अतिशय अनिवार्य (कृणुते) बनाता है ॥६॥

भावार्थ : हे युद्धविद्याविशारद कर्मयोगिन् ! आपकी स्तुति द्वारा आपसे शिक्षा प्राप्त किया हुआ पुरुष अति तीव्र युद्ध करनेवाला तथा सहस्रों योद्धाओं से युक्त होता है और जो नम्रतापूर्वक आपका सत्कार करता है, वह स्वयं युद्धविशारद होता और कर्मयोगी की अध्यक्षता में रहने के कारण उसकी सन्तान भी संग्राम में कुशल होती है अर्थात् उसको कोई युद्ध में निवारण=हटा नहीं सकता ॥६ ॥