Rigveda / 1 / 147 / 3
ये पा॒यवो॑ मामते॒यं ते॑ अग्ने॒ पश्य॑न्तो अ॒न्धं दु॑रि॒तादर॑क्षन्। र॒रक्ष॒ तान्त्सु॒कृतो॑ वि॒श्ववे॑दा॒ दिप्स॑न्त॒ इद्रि॒पवो॒ नाह॑ देभुः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 147 | Mantra No : 3
In English:
Seer : diirghatamaa auchathyaH | Devta : agniH | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : ye paayavo maamateya.m te agne pashyanto andha.m duritaadarakShan. rarakSha taantsukRRito vishvavedaa dipsanta idripavo naaha debhuH .
Component Words : ye. paayavaH. maamateyam. te. agne. pashyantaH. andham. duH.aitaat. arakShan. rarakSha. taan. su.akRRitaH. vishva.avedaaH. dipsantaH. it. ripavaH. na. aha. debhuH . 1.147.3
In Hindi:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : ये। पा॒यवः॑। मा॒म॒ते॒यम्। ते॒। अ॒ग्ने॒। पश्य॑न्तः। अ॒न्धम्। दुः॒ऽइ॒तात्। अर॑क्षन्। र॒रक्ष॑। तान्। सु॒ऽकृतः॑। वि॒श्वऽवे॑दाः। दिप्स॑न्तः। इत्। रि॒पवः॑। न। अह॑। दे॒भुः॒ ॥ १.१४७.३
पदार्थ : हे (अग्ने) विद्वान् ! (ते) आपके (ये) जो (पश्यन्तः) अच्छे देखनेवाले (पायवः) रक्षा करनेवाले (मामतेयम्) प्रजा का अपत्य जो कि (अन्धम्) अविद्यायुक्त हो उसको (दुरितात्) दुष्ट आचरण से (अक्षरन्) बचाते हैं (तान्) उन (सुकृतः) सुकृती उत्तम कर्म करनेवाले जनों को (विश्ववेदः) समस्त विज्ञान के जाननेवाले आप (ररक्ष) पालें, जिससे (दिप्सन्तः) हम लोगों को मारने की इच्छा करते हुए (इत्) भी (रिपवः) शत्रुजन (न, अह) नहीं (देभुः) मार सकें ॥ ३ ॥
भावार्थ : जो विद्याचक्षु जन अन्धे को कूप से जैसे वैसे मनुष्यों को अविद्या और अधर्म के आचरण से बचावें, उनका पितरों के समान सत्कार करें और जो दुष्ट आचरणों में गिरावें, उनका दूर से त्याग करे रहें ॥ ३ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ।
पदपाठ : ये। पा॒यवः॑। मा॒म॒ते॒यम्। ते॒। अ॒ग्ने॒। पश्य॑न्तः। अ॒न्धम्। दुः॒ऽइ॒तात्। अर॑क्षन्। र॒रक्ष॑। तान्। सु॒ऽकृतः॑। वि॒श्वऽवे॑दाः। दिप्स॑न्तः। इत्। रि॒पवः॑। न। अह॑। दे॒भुः॒ ॥ १.१४७.३
पदार्थ : (ये) (पायवः) रक्षकाः (मामतेयम्) ममतायाः प्रजायाः अपत्यम् (ते) तव (अग्ने) विद्वन् (पश्यन्तः) संप्रेक्षमाणाः (अन्धम्) अविद्यायुक्तम् (दुरितात्) दुष्टाचारात् (अरक्षन्) रक्षन्ति (ररक्ष) रक्षेत् (तान्) (सुकृतः) सुष्ठुकर्मकारिणः (विश्ववेदाः) यो विश्वं विज्ञानं वेत्ति सः (दिप्सन्तः) अस्मान् दम्भितुं हिंसितुमिच्छन्तः (इत्) अपि (रिपवः) अरयः (न) निषेधे (अह) विनिग्रहे (देभुः) दभ्नुयुः ॥ ३ ॥
अन्वय : हे अग्ने विद्वन् ते ये पश्यन्तः पायवो मामतेयमन्धं दुरितादरक्षन् तान् सुकृतो विश्ववेदा भवान् ररक्ष यतो दिप्सन्त इद्रिपवो नाह देभुः ॥ ३ ॥
भावार्थ : ये विद्याचक्षुषोऽन्धं कूपादिव जनानविद्याऽधर्माचरणाद्रक्षेयुस्तान् पितृवत्सत्कुर्युः। ये च व्यसनेषु निपातयेयुस्तान् दूरतो वर्जयेयुः ॥ ३ ॥