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Rigveda / 8 / 5 / 30

तेन॑ नो वाजिनीवसू परा॒वत॑श्चि॒दा ग॑तम् । उपे॒मां सु॑ष्टु॒तिं मम॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 5 | Mantra No : 30

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मातिथिः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : तेन॑ । नः॒ । वा॒जि॒नी॒व॒सू॒ इति॑ वाजिनीऽवसू । प॒रा॒ऽवतः॑ । चि॒त् । आ । ग॒त॒म् । उप॑ । इ॒माम् । सु॒ऽस्तु॒तिम् । मम॑ ॥ ८.५.३०

पदार्थ : (वाजिनीवसू) हे बलयुक्त धनवाले ! (तेन) तिस रथ द्वारा (नः) हमारे समीप (परावतश्चित्) दूरदेश से (आगतम्) आइये (इमाम्, मम, सुष्टुतिम्) इस मेरी सुस्तुति का (उप) उपश्रवण करें ॥३०॥

भावार्थ : हे बलसम्पन्न ऐश्वर्य्यशालिन् ! आप कृपा करके उक्त सुवर्णमय रथ द्वारा देशान्तर से हमारे यज्ञ में सम्मिलित हों, हमारी इस प्रार्थना को अवश्य श्रवण करें ॥३० ॥