Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 8 / 6 / 2

प्र॒जामृ॒तस्य॒ पिप्र॑त॒: प्र यद्भर॑न्त॒ वह्न॑यः । विप्रा॑ ऋ॒तस्य॒ वाह॑सा ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 6 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वत्सः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब परमात्मा को सत्य का स्रोत कथन करते हैं।

पदपाठ : प्र॒ऽजाम् । ऋ॒तस्य॑ । पिप्र॑तः । प्र । यत् । भर॑न्त । वह्न॑यः । विप्राः॑ । ऋ॒तस्य॑ । वाह॑सा ॥ ८.६.२

पदार्थ : (यत्) जब (ऋतस्य, प्रजाम्) सत्य के उत्पत्तिस्थान परमात्मा को (पिप्रतः) हृदय में पूरित करते हुए (वह्नयः) वह्निसदृश विद्वान् (भरन्त) उपदेश द्वारा लोक में प्रकाशित करते हैं (ऋतस्य) तब सत्य की (वाहसा) प्राप्ति करानेवाले स्तोत्रों द्वारा (विप्राः) स्तोता लोग उसके माहात्म्य को जानकर स्तुति करते हैं ॥२॥

भावार्थ : जब वह्निसदृश=तेजस्वी विद्वान् हृदय में धारण करते हुए अपने उपदेशों द्वारा उस सत्य के स्रोत=उत्पत्तिस्थान परमात्मा को लोक-लोकान्तरों में प्रकाशित करते हैं, तब स्तोता लोग उसके माहात्म्य को जानकर परमात्मोपासन में प्रवृत्त होते और उसके सत्यादि गुणों को धारण कर अपने जीवन को उच्च बनाते हैं, इसलिये प्रत्येक पुरुष को उचित है कि विद्वानों द्वारा श्रवण किये हुए परमात्मा के गुणों को धारण कर अपने जीवन को पवित्र बनावें ॥२ ॥