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Rigveda / 8 / 6 / 8

गुहा॑ स॒तीरुप॒ त्मना॒ प्र यच्छोच॑न्त धी॒तय॑: । कण्वा॑ ऋ॒तस्य॒ धार॑या ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 6 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : वत्सः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब सत्याश्रित कर्म करनेवाले को उत्तम फल की प्राप्ति कथन करते हैं।

पदपाठ : गुहा॑ । स॒तीः । उप॑ । त्मना॑ । प्र । यत् । शोच॑न्त । धी॒तयः॑ । कण्वाः॑ । ऋ॒तस्य॑ । धार॑या ॥ ८.६.८

पदार्थ : (यत्) जो (धीतयः) कर्म (गुहा, सतीः) गुहा में विद्यमान हैं, वे (त्मना) स्वयं परमात्मा से (उप) जाने हुए (प्रशोचन्त) भासित हो रहे हैं, इससे (कण्वाः) उसके माहात्म्य को जाननेवाले विद्वान् (ऋतस्य, धारया) सत्य के प्रवाह से उसका सेवन करते हैं ॥८॥

भावार्थ : जो कर्म हमारी हृदयरूप गुहा में विद्यमान हैं अर्थात् जो प्रारब्ध कर्म हैं, उन सबको परमात्मा भले प्रकार जानते हैं, क्योंकि परमात्मा मनुष्य के बाहर-भीतर सर्वत्र विराजमान हैं, इसलिये विद्वान् पुरुष सदैव सत्य के आश्रित होकर कर्म करते हैं, ताकि वह शुभ फल के भागी हों, अतएव शुभफल की कामनावाले प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह परमात्मा का महत्त्व जानते हुए प्रत्येक कर्म सत्य के आश्रित होकर करें, ताकि उनको उत्तम फल की प्राप्ति हो ॥८ ॥