Rigveda / 8 / 6 / 13
यद॑स्य म॒न्युरध्व॑नी॒द्वि वृ॒त्रं प॑र्व॒शो रु॒जन् । अ॒पः स॑मु॒द्रमैर॑यत् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 6 | Mantra No : 13
In English:
Seer : vatsaH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yadasya manyuradhvaniidvi vRRitra.m parvasho rujan . apaH samudramairayat .
Component Words : yat . asya . manyuH . adhvaniit . vi . vRRitram . parva.ashaH . rujan . apaH . samudram . airayat . 8.6.13
In Hindi:
ऋषि : वत्सः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : यत् । अ॒स्य॒ । म॒न्युः । अध्व॑नीत् । वि । वृ॒त्रम् । प॒र्व॒ऽशः । रु॒जन् । अ॒पः । स॒मु॒द्रम् । ऐर॑यत् ॥ ८.६.१३
पदार्थ : (यत्) जब (अस्य, मन्युः) इसका प्रभाव (अध्वनीत्) प्रादुर्भूत हुआ तब (वृत्रम्) वारक अज्ञान को (पर्वशः) पर्व-पर्व में (विरुजन्) भग्न करता हुआ (अपः, समुद्रम्) जल तथा समुद्र को (ऐरयत्) प्रादुर्भूत करता है ॥१३॥
भावार्थ : जब उपासक उपासनाओं द्वारा शुद्ध हो जाता है अर्थात् उसके मल-विक्षेपादि निवृत्त हो जाते हैं, तब परमात्मा उसमें अज्ञान की निवृत्ति द्वारा ज्ञान का प्रादुर्भाव करते हैं अर्थात् उपासक तपश्चर्या के प्रभाव से ज्ञान प्राप्त कर सुखोपभोग करता है, अतएव सुख की कामनावाले पुरुषों को उचित है कि वे अज्ञान की निवृत्तिपूर्वक ज्ञान की वृद्धि करने में सदा तत्पर रहें ॥१३ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : वत्सः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : यत् । अ॒स्य॒ । म॒न्युः । अध्व॑नीत् । वि । वृ॒त्रम् । प॒र्व॒ऽशः । रु॒जन् । अ॒पः । स॒मु॒द्रम् । ऐर॑यत् ॥ ८.६.१३
भावार्थ :