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Rigveda / 8 / 7 / 23

वि वृ॒त्रं प॑र्व॒शो य॑यु॒र्वि पर्व॑ताँ अरा॒जिन॑: । च॒क्रा॒णा वृष्णि॒ पौंस्य॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 7 | Mantra No : 23

In Hindi:

ऋषि : पुनर्वत्सः काण्वः | देवता : मरूतः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : वि । वृ॒त्रम् । प॒र्व॒ऽशः । य॒युः॒ । वि । पर्व॑तान् । अ॒रा॒जिनः॑ । च॒क्रा॒णाः । वृष्णि॑ । पौं॒स्य॑म् ॥ ८.७.२३

पदार्थ : (अराजिनः) स्वतन्त्र (वृष्णि, पौंस्यम्, चक्राणाः) तीक्ष्ण पौरुष करते हुए वे लोग (वृत्रम्) अपने मार्गरोधक शत्रु को (पर्वशः) पर्व-पर्व में (विययुः) विभिन्न कर देते हैं (पर्वतान्) और मार्गरोधक पर्वतों को भी (वि) तोड़-फोड़ डालते हैं ॥२३॥

भावार्थ : वे अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग को जाननेवाले विद्वान् पुरुष अपने परिश्रम द्वारा मार्गरोधक शत्रुओं को छिन्न-भिन्न करके भगा देते हैं और वे जिन पर्वतों का आश्रय लेते हैं, उनको भी अपनी विद्याद्वारा तोड़-फोड़ कर शत्रुओं का निरोध करते हैं ॥२३ ॥