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Rigveda / 8 / 8 / 6

यच्चि॒द्धि वां॑ पु॒र ऋष॑यो जुहू॒रेऽव॑से नरा । आ या॑तमश्वि॒ना ग॑त॒मुपे॒मां सु॑ष्टु॒तिं मम॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 8 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : सध्वंशः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : यत् । चि॒त् । हि । वा॒म् । पु॒रा । ऋष॑यः । जु॒हू॒रे । अव॑से । न॒रा॒ । आ । या॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । आ । ग॒त॒म् । उप॑ । इ॒माम् । सु॒ऽस्तु॒तिम् । मम॑ ॥ ८.८.६

पदार्थ : (अश्विना) हे व्यापक ! (यत्, चित्, हि) जब (पुरा) पूर्वकाल में (ऋषयः) विद्वान् लोग (वाम्) आपको (अवसे) रक्षा के लिये (जुहूरे) आह्वान करते थे, तब आप (आयातम्) आते थे। इसी प्रकार (मम, सुष्टुतिम्) मेरी सुन्दर स्तुति के (आ) अभिमुख (उपगतम्) आइये ॥६॥

भावार्थ : हे सर्वत्र प्रसिद्ध सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष ! आप पूर्वकाल की न्याईं हमारे विद्यावृद्धिविषयक यज्ञोत्सव में आकर रक्षा करें और धन-धान्य से सहायता प्रदान करें, ताकि हमारा यज्ञ पूर्ण हो ॥६ ॥